सबकी नकल करना छोड़ दो नकल करना है तो वीतरागता की नकल करो पूर्णमति माताजी
परम पूज्या स्वर कोकिला आर्यिका 105 पूर्णमति माताजी सानिध्य मे समवशरण महामंडल विधान का आयोजन हुआ। इस पुनीत बेला मे माताजी अपना उद्बोधन दिया उन्होने धार्मिक कार्यो व् संतो की वाणी सुनने की और प्रेरित किया। माताजी ने अपनी अमृतवाणी से सभी को कहा जो व्यक्ति स्वयं को धार्मिक कार्यो से वंचित रखता है वो अभागा होता है।
उन्होने यह भी कहा जो व्यक्ति दुकान खोलकर तो बैठते है,लेकिन अपने कानो को नहीं खोल पाते है, और साधु की वाणी को सुनने नहीं आ पाते। माताजी ने ध्यान दिलाते हुए कहा घर गृहस्थी के कार्यो मे अनेक कर्मो का बंधन होता है। इन्ही कर्म बंधन को काटने हेतु जिनमन्दिर बनाए गए है। वही उन्होने मुख्यता से कहा सबकी नक़ल करना छोड़ दो अगर नक़ल करना है तो वीतरागता की नक़ल करो। घर मे प्रेम को बनाए रखे सामूहिक भोजन करे सामाज मे प्रेम का वातावरण बनाए।
सबसे अच्छा योग सहयोग है
माताजी ने कुछ और बिन्दुओ पर सभी का ध्यान दिलाया उन्होंने कहा दुनिया मे यदि सबसे कठिन आसन है, तो वह आश्वासन है।सबसे लंबा विश्वास श्वास है। और सबसे कठिन योग वियोग है। और यदि सबसे अच्छा योग है तो वो सहयोग है।
राहतगढ़ समाज की भरी भूरी तारीफ़ की
आर्यिका माताजी ने राहतगढ़ समाज की भरी भूरी तारीफ़ की और कहा सहयोग का सबसे अच्छा नमूना है तो वह है राहतगढ़ जैन समाज। जहा एक दिवस मे सुन्दर समवसरण की रचना हुयी और एक ही दिन मे भक्तिमय विधान शुरू हो गया।उन्होने अंत मे कहा प्रभु भक्ति की आराधना केवल भव्य जीव ही कर पाते है।
संकलित अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
