पंचम काल में मुनि परंपरा का पुनर्जागरण करने वाले युगपुरुष थे आचार्य विद्यासागर जी : मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज

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पंचम काल में मुनि परंपरा का पुनर्जागरण करने वाले युगपुरुष थे आचार्य विद्यासागर जी : मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज

 

59वें दीक्षा दिवस पर गुणायतन में विनयांजलि सभा, बोले— गुरु को पाना नहीं, गुरु का बन जाना ही सच्ची गुरु-भक्ति; गुरु के मार्ग को आगे बढ़ाना ही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि

 

मधुबन (गिरिडीह)।

आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज के 59वें दीक्षा दिवस पर गुणायतन में आयोजित विशेष विनयांजलि एवं प्रवचन सभा श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत रही। इस अवसर पर राष्ट्रसंत मुनि श्री 108 प्रमाण सागर महाराज ने गुरु-शिष्य परंपरा, गुरु-भक्ति और आचार्य विद्यासागर जी के अप्रतिम योगदान पर ओजस्वी प्रवचन देते हुए कहा कि आचार्य विद्यासागर जी ने पंचम काल में मुनि परंपरा का पुनर्जागरण कर इतिहास रच दिया। उनके बताए मार्ग पर चलना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि और वास्तविक गुरु-भक्ति है।

 

मुनि श्री ने कहा कि यह दिवस केवल गुरुदेव के मुनि दीक्षा ग्रहण करने की स्मृति नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक क्षण का प्रतीक है जब आचार्य विद्यासागर जी ने अपने तप, त्याग, संयम और निष्कलंक चरित्र के बल पर उस भ्रम को समाप्त किया कि पंचम काल में यथार्थ मुनि नहीं हो सकते। उन्होंने समाज में मुनि परंपरा को नई प्रतिष्ठा और नई ऊर्जा प्रदान की।

 

उन्होंने पंडित कैलाशचंद सिद्धांत शास्त्री का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जिनकी मुनियों के प्रति श्रद्धा समाप्त हो चुकी थी, वे आचार्य विद्यासागर जी के प्रथम दर्शन मात्र से भावविभोर हो गए और स्वीकार किया कि उनके दर्शन से सभी भ्रम दूर हो जाते हैं। यह घटना स्वयं मुनि परंपरा के पुनर्जागरण की सशक्त मिसाल है।

 

मुनि श्री ने कहा कि यदि उस विषम काल में आचार्य विद्यासागर जी का अवतरण नहीं हुआ होता तो समाज की आध्यात्मिक धारा अत्यंत क्षीण हो जाती। हम सब सौभाग्यशाली हैं कि ऐसे युगपुरुष का सान्निध्य हमें प्राप्त हुआ।

 

उन्होंने प्रत्येक साधक के लिए चार सूत्र बताते हुए कहा कि जीवन में गुरु को पहचानना, गुरु को पाना, गुरु का बन जाना और गुरु के मार्ग को आगे बढ़ाना—यही साधना की पूर्णता है। गुरु केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि वह परम सत्ता हैं जो अज्ञान का नाश कर आत्मबोध और मोक्षमार्ग की दिशा प्रदान करती है।

 

मुनि श्री ने कहा कि वास्तविक समर्पण तब होता है जब शिष्य अपना अहंकार त्यागकर यह भाव धारण कर ले कि “मेरा कुछ नहीं, जो कुछ है वह गुरु का है।” गुरु की कृपा सदैव बरसती रहती है, किंतु उसका लाभ वही प्राप्त करता है जिसके हृदय में श्रद्धा और समर्पण के द्वार खुले हों।

 

अपने जीवन का संस्मरण सुनाते हुए मुनि श्री ने बताया कि दीक्षा के बाद वे जैन सिद्धांत ग्रंथों का अध्ययन करना चाहते थे, जबकि आचार्य विद्यासागर जी ने उन्हें तीन बार “साहित्य पढ़ो” का निर्देश दिया। उन्होंने स्वीकार किया कि यदि उस समय गुरु की इच्छा को अपनी इच्छा बना लिया होता तो साहित्य और संस्कृत पर भी असाधारण अधिकार प्राप्त हो जाता। इस प्रसंग से उन्होंने संदेश दिया कि गुरु की इच्छा सदैव शिष्य की इच्छा से श्रेष्ठ होती है।

 

उन्होंने कहा कि यदि गुरु कोई कठिन साधना सौंपें तो अपनी सीमाओं का विचार नहीं करना चाहिए, क्योंकि गुरु की कृपा से शक्तिहीन भी शक्तिवान बन जाता है। हमारी सच्ची भक्ति ही गुरु की शक्ति का माध्यम बनती है।

 

मुनि श्री ने कहा कि आज अधिकांश लोग गुरु को अपना बनाने का प्रयास करते हैं, जबकि वास्तविक साधना स्वयं गुरु का बन जाने में है। गुरु के वचनों को जीवन में उतारना ही आत्मकल्याण का सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग है।

 

प्रवचन के समापन पर उन्होंने भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि आचार्य विद्यासागर जी ने समाज को आध्यात्मिक संस्कारों और साधना की अमूल्य विरासत दी है। अब प्रत्येक श्रद्धालु का दायित्व है कि वह अपने आचार, विचार, व्यवहार और चरित्र से गुरु के संदेश को जन-जन तक पहुँचाए। ऐसा जीवन जिए कि किसी को यह पूछने की आवश्यकता ही न पड़े कि आपका गुरु कौन है, बल्कि आपका आचरण ही गुरु के संस्कारों का परिचय बन जाए।

 

राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज के 59वें दीक्षा दिवस के अवसर पर भगवान का अभिषेक एवं विशेष शांतिधारा मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज के सान्निध्य में संपन्न हुई। इसके पश्चात गणधर वलय विधान मुनि श्री संधान सागर महाराज के मुखारविंद से सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का संचालन अशोक भैया एवं अभय भैया ने किया। इस अवसर पर मुनि सारसागर, समादरसागर महाराज सहित मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार तथा देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

 

— संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

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