विरली माताए होती है जो सु संतान, महापुरुषों तथा तीर्थकरों को जन्म देती है”प्रमाण सागर महाराज

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, विरली माताए होती है जो सु संतान, महापुरुषों तथा तीर्थकरों को जन्म देती है”प्रमाण सागर महाराज
इंदौर
संतान को जन्म देने का सौभाग्य हर किसी को नहीं मिलता विरली माताऐं होती है जो सु संतान, महापुरुषों तथा तीर्थकरों को जन्म देती है”उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने “भक्तामर स्त्रोत्र” में छुपे रहस्यों की व्याख्या करते हुये व्यक्त किये।

 

मुनि श्री ने कहा कि आज सैकड़ों माताओं द्वारा सैकड़ों संतानों को नित्य जन्म देती है लेकिन ऐसी कितनी माताऐं है जिन्होंने गर्भ धारण से लेकर संतान के जन्म होंने तक अपने आप को संयम से बिताया हो।उन्होंने कहा कि भले ही संतान की पहचान पिता से हुआ करती हैं,लेकिन उसके व्यक्तित्व के विकास में मां का बहुत बड़ा योगदान रहता है, जिनको मां रुपी धरती का संरक्षण मिल जाता है वह बीज पल्लवित हो जाते है और जिन बच्चों को मां का संरक्षण नहीं मिल पाता है वह बच्चे विकास को प्राप्त न होकर असमय में काल कल्वित हो जाते है।

मार्मिक प्रवचन देते हुए महाराज श्री ने मां की महिमा बताते हुये कहा कि हमारे देश में मां का नाम पहले लिया जाता है पिता का नाम बाद में आता है,उन्होंने कहा कि कुरल काव्य में कहा है कि जैसे भूमी की उर्वरता का पता उसमें बोये गये बीज से पता पड़ता है वैसे ही संतान के आचरण से उसके माता पिता तथा कुल का पता चल जाता है। जहा एक और मां सु संतान की जन्मदात्री है, जीवन निर्मात्री हे, तथा संस्कार दायनी है, वही यदि संतान की मातृत्व के अभाव में अनेक प्रकार की समस्यायें जन्म लेती है,उन्होंने कहा कि जब तीर्थंकर प्रभु का जन्म होता है तो गर्भ धारण से लेकर पूरे नौ माह तक देवियाँ माता की सेवा करती है, पहले के लोग जानते थे कि मां जितनी प्रसन्न रहेगी संतान भी उतनी प्रसन्न होगी, मां में जितना उल्लास और पराक्रम होगा संतान भी उतनी उल्लसित और पराक्रमी होगी,उन्होंने कहा कि

 

मां के भाव का प्रभाव पेट में पलने वाली संतान पर पड़ता है इस बात को विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है, मां के गर्भ में पलने वाली संतान का संवाद मां से रहता है

उन्होंने सभी माताओं को संबोधित करते हुये कहा कि नौ माह पर्यन्त तक अपना जीवन पूरा संयम से बिताए तथा अपना पूरा समय महापुरुषों की गाथाओं को सुनने,तथा प्रतिदिन भावनायोग के माध्यम स्वस्थ और निरोग संतान को इस धरती पर लाए, आज की नवीन पीढ़ी पर कटाक्ष करते हुए महाराज श्री ने कहा कि आजकल की नई पीढ़ी तो इसे प्रमुखता देती ही नहीं इसीलिये तो शारिरिक विकृतियों के साथ बच्चे जन्म ले रहे है? इसकी सबसे अधिक जबाबदारी उन मां बाप की है जिन्होंने गर्भ धारण के पश्चात संयम को धारण नहीं किया, यदि गर्भ धारण से ही संयम का पालन और संतान को सु संस्कार दिये जाए तो इस प्रकार की विकृतियो से बचा जा सकता है। लेकिन विडंबना यह है कि गर्भ धारण के पश्चात आजकल की मां उन संस्कारों का पालन ही नहीं करना चाहती है।मुनि श्री ने कहा आप भले ही किसी तीर्थंकर अथवा महापुरुष को जन्म न दे पाओ कोई बात नहीं, लेकिन सु संस्कारित और स्वस्थ संतान को तो जन्म दे ही सकती है,उन्होंने कहा कि भावनायोग के प्रभाव से जिन बच्चों के मूमेंट नहीं थे वह भी स्वस्थ पैदा हो गये। मुनि श्री ने कहा कि मां ममता का मंगल कलश है,लेकिन आज कल की माताऐं तो अपने बच्चों को दूध भी नहीं पिलाना चाहती यह कैसी विडंबना है? जो माताए गांधारी के समान अपनी संतान को ठीक से नह़ी देखती उनकी संतान जन्म तो लेती है,लेकिन वह दुर्योधन की तरह संस्कार विहीन होकर अपने ही कुल को नष्ट कर देते है,तथा जो मां गर्भावस्था में नियमों का पालन नहीं करती उनके बच्चे अपंग और बीमार पैदा होते है।उन्होंने कहा कपूतों को तो कोई भी जन्म दे सकता है लेकिन सपूतों को जन्म देने वाली कुछ मां ही हुआ करती है। बचपन में दिये गये संस्कारों से ही मां श्रीमंति ने आचार्य गुरुदेव विद्यासागर जी जैसे रत्न इस संसार को दिये यह मां श्रीमंती के संयम का ही प्रभाव था कि आज उनका पूरा परिवार ही संयम की राह पर चल रहा है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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