बैंड-बाजों के साथ आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज का उदय नगर में भव्य मंगल प्रवेश, गुणों की उपासना और मुमुक्षुता पर दिया प्रेरक संदेश
इंदौर।16 जुलाई।*
परम पूज्य आचार्य श्री 108 सुनील सागर जी महाराज ससंघ का गोयल नगर से विहार होकर उदय नगर में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। बैंड-बाजों और जयघोष के बीच निकली शोभायात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। उदय नगर पहुंचने पर श्रावक-श्राविकाओं ने आचार्य श्री का भावपूर्ण स्वागत किया तथा सामूहिक रूप से गुरुदेव का पादप्रक्षालन कर पुण्यार्जन किया। इसके पश्चात आचार्य श्री ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए गुणों की उपासना, मुमुक्षुता और विवेकपूर्ण जीवन पर प्रेरणादायी प्रवचन प्रदान किए।
आचार्य श्री ने कहा कि संपूर्ण धरती हरियाली, धन-धान्य और समृद्धि से परिपूर्ण हो, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति धर्म, ध्यान और तत्त्वज्ञान से लबालब भरा हो। वास्तविक समृद्धि बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि आत्मा के गुणों के जागरण में निहित है।

उन्होंने कहा कि हम गुणों के उपासक हैं। यदि हम गुणों की आराधना नहीं कर पा रहे हैं, तो एक छोटी-सी चींटी भी हमसे श्रेष्ठ है। चींटी को यह नहीं पता होता कि शक्कर कहाँ रखी है, फिर भी वह अपनी लगन और प्रयास से उसकी मिठास तक पहुँच जाती है। उसी प्रकार साधक को भी गुणों की प्राप्ति के लिए निरंतर पुरुषार्थ करना चाहिए।
प्रवचन में आचार्य श्री ने कहा कि ज्ञानी व्यक्ति मंदिर का नाम या वहाँ आने वाले लोगों का समूह नहीं देखता, बल्कि भगवान की वीतराग प्रतिमा के गुणों को देखता है। “मुमुक्षु” अर्थात मोक्ष की इच्छा रखने वाला जीव अत्यंत भाग्यशाली होता है। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर मुमुक्षुता का जागरण होना चाहिए। कई बार लोग स्वयं को मुमुक्षु कहते हैं, लेकिन गुणवान तपस्वियों के गुणों का लाभ नहीं ले पाते।
उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि किसी के प्रभाव में बहने के बजाय स्वयं विवेक से विचार करें। अच्छी बातों को स्वीकार करें, लेकिन उन पर स्वयं भी मनन करें। तपस्या से शरीर भले ही दुर्बल या काला पड़ जाए, किंतु आत्मा का तेज और आनंद अद्भुत होता है। जैसे कोयले की खान से हीरा निकलता है, वैसे ही कठोर तप से महान व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
आचार्य श्री ने कहा कि तपस्वियों का मूल्यांकन उनके रूप, रंग या बाहरी व्यक्तित्व से नहीं, बल्कि उनके व्रतों के प्रति अटूट निष्ठा, भेद-विज्ञान और साधना से करना चाहिए। उन्होंने एक तपस्वी सम्राट का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि उनके पैरों के घाव से चींटियाँ मांस के छोटे-छोटे कण ले जा रही थीं। पूछने पर उन्होंने शांत भाव से कहा—”वे अपना कार्य कर रही हैं और मैं अपना कार्य कर रहा हूँ।” यह समता और भेद-विज्ञान का अनुपम उदाहरण है।
अपने प्रवचन के समापन में आचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति की वास्तविक कीमत इस बात से तय नहीं होती कि आप क्या है, बल्कि इस बात से होती है कि आप किसके साथ है। संसारी लोगों की अपेक्षा संतों और तपस्वियों का सान्निध्य आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।
माही जैन धीरावत से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312


