“सिर्फ प्रशंसा नहीं, संकल्प करो—मुझे भी ऐसा बनना है”: राष्ट्रसंत मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज

धर्म

“सिर्फ प्रशंसा नहीं, संकल्प करो—मुझे भी ऐसा बनना है”: राष्ट्रसंत मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज

धर्म के लिए जीवन दांव पर लगाने का भाव जगाइए, पापियों की नहीं उनके दृढ़ संकल्प की शक्ति से सीखिए — शाजापुर के निकट विशाल धर्मसभा में गूंजे प्रेरक उद्बोधन | इंदौर में ऐतिहासिक चातुर्मास को लेकर बढ़ा उत्साह, आनंद गोधा बोले—’हम संकल्पित हैं’

शाजापुर।

शाजापुर के निकट आयोजित विशाल धर्मसभा में राष्ट्रसंत मुनि पुंगव श्री 108 सुधासागरजी महाराज ने श्रद्धालुओं को धर्म, संकल्प और आत्मबल का अद्भुत संदेश देते हुए कहा कि सज्जन पुरुष को देखकर केवल उसकी प्रशंसा मत करो, बल्कि उसी क्षण संकल्प लो कि मुझे भी उसके जैसा बनना है। उन्होंने कहा कि सच्चा धर्म केवल सुनने या सराहने का विषय नहीं, बल्कि उसे जीवन में उतारने का दृढ़ निश्चय ही वास्तविक साधना है।

 

 

इसी अवसर पर धर्मप्रेमी आनंद गोधा ने कहा कि “हम सभी इंदौरवासी पूज्य गुरुदेव का ऐतिहासिक चातुर्मास कराने के लिए पूर्ण संकल्पित हैं।” इस घोषणा से श्रद्धालुओं में उत्साह की लहर दौड़ गई।

 

धर्म पसंद है तो उसे जीवन में उतारिए

 

मुनिश्री ने कहा कि यदि किसी धर्मात्मा को मंदिर जाते देखकर आपको अच्छा लगता है तो केवल “अच्छा है” कहकर मत रह जाइए। उसी समय संकल्प लीजिए कि मैं भी मंदिर जाऊँगा, मैं भी धर्ममार्ग पर चलूँगा। धर्म की वास्तविक शुरुआत संकल्प से होती है।

 

जो अच्छा लगे, उसे पाने का दृढ़ निश्चय करें

 

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार एक पापी व्यक्ति धन प्राप्त करने के लिए हर जोखिम उठाने को तैयार रहता है, उसी प्रकार यदि धर्म प्राप्त करने के लिए मनुष्य दृढ़ निश्चय कर ले तो उसकी आध्यात्मिक उन्नति को कोई रोक नहीं सकता। उन्होंने कहा कि जो वस्तु वास्तव में अच्छी लगे, उसे पाने का संकल्प अवश्य करना चाहिए।

 

पापियों की संकल्प शक्ति से सीखिए

 

अपने प्रवचन में मुनिश्री ने रावण का उदाहरण देते हुए कहा कि उसने अपनी इच्छा पूरी करने के लिए पूरी लंका, परिवार और स्वयं का जीवन तक दांव पर लगा दिया। उन्होंने कहा कि पापियों की संकल्प शक्ति और इच्छा शक्ति बहुत प्रबल होती है, लेकिन यदि यही दृढ़ता धर्म के लिए जाग जाए तो समाज और संसार का कल्याण हो सकता है।

 

धर्म के लिए क्या हम जीवन दांव पर लगा सकते हैं?

 

मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से आत्ममंथन करने का आह्वान करते हुए कहा कि क्या कभी हमारे मन में धर्म के लिए अपना सुख, समय, धन या जीवन समर्पित करने का भाव आया है? उन्होंने कहा कि उन्होंने स्वयं धर्म को सर्वोच्च मानकर परिवार, वैभव और सांसारिक सुखों का त्याग किया है।

 

आतंकवादियों का उदाहरण देकर समझाई संकल्प शक्ति

 

उन्होंने कहा कि कई बार दो आतंकवादी सैकड़ों लोगों को बंधक बना लेते हैं। संख्या अधिक होने के बावजूद लोग इसलिए हार जाते हैं क्योंकि उनमें संकल्प शक्ति का अभाव होता है। उन्होंने कहा कि आज संसार में अधर्म इसलिए आगे बढ़ रहा है क्योंकि अधर्मी का संकल्प मजबूत है और धर्मात्मा का संकल्प कमजोर पड़ गया है।

 

अच्छाई को जीताना है तो संकल्प जगाइए

 

राष्ट्रसंत ने कहा कि आज समाज में बुराई इसलिए बढ़ रही है क्योंकि लोग अच्छी बातों की प्रशंसा तो करते हैं, लेकिन उन्हें अपनाने का साहस नहीं जुटा पाते। उन्होंने आह्वान किया कि यदि प्रत्येक धर्मात्मा अपने भीतर दृढ़ इच्छा शक्ति और संकल्प शक्ति जगा ले तो अधर्म स्वतः पराजित हो जाएगा और धर्म की विजय निश्चित होगी।

 

— संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

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