वैराग्य ही आत्मबोध का मार्ग — आचार्य श्री सुनील सागरजी महाराज*

धर्म

*वैराग्य ही आत्मबोध का मार्ग — आचार्य श्री सुनील सागरजी महाराज*

इंदौर 

प्राकृत भाषा की एक प्रेरणादायक गोष्ठी में वैराग्य और आत्मबोध पर प्रकाश डालते हुए आचार्य श्री सुनील सागरजी महाराज ने कहा कि वैराग्य का वास्तविक पाठ केवल वैराग्यवान महापुरुषों से ही सीखा जा सकता है।

 

 

उन्होंने एक सुंदर छंद के माध्यम से समझाया कि ज्ञानी पुरुष न तो भूतकाल की स्मृतियों में उलझते हैं, न भविष्य की अपेक्षाओं में जीते हैं और न ही भोगों की प्राप्ति पर आसक्त होते हैं। वे विषय-विकारों को विष के समान मानकर उनसे दूर रहते हैं।

 

 

आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि मनुष्य के दुःख का मूल कारण देह में आत्मबुद्धि है। जब व्यक्ति शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान लेता है, तब वह अन्य पदार्थों में भी ममता और आसक्ति विकसित कर लेता है। जबकि आत्मा शरीर से सर्वथा भिन्न, ज्ञायक-स्वभावयुक्त चैतन्य सत्ता है।

 

 

उन्होंने कहा कि भगवान के प्रति राग भी अंततः भगवान बनने में बाधक बन सकता है। यदि भगवान के प्रति आसक्ति भी मुक्ति में अवरोध है, तो संसार के धन, मकान और अन्य भौतिक वस्तुओं का राग आत्मकल्याण में कितना बड़ा अवरोध होगा, यह सहज समझा जा सकता है।

आचार्यश्री ने आत्मचिंतन का संदेश देते हुए कहा कि प्रत्येक साधक को स्वयं से यह प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए—”मैं कौन हूँ?” जब तक आत्मा के वास्तविक स्वरूप का अनुभव नहीं होगा, तब तक आध्यात्मिक यात्रा अधूरी रहेगी।

 

उन्होंने प्राकृत भाषा के महत्व पर भी विशेष प्रकाश डालते हुए कहा कि इस भाषा में रचित प्रत्येक सूत्र अनुभवी महापुरुषों की प्रत्यक्ष अनुभूति का सार है। ये अमूल्य सूत्र साधक को आत्मबोध और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करने की अद्भुत सामर्थ्य रखते हैं।

 

अपने उद्बोधन का समापन करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि गृहस्थ जीवन में सम्यग्दृष्टि के साथ सीमित राग संभव हो सकता है, किंतु राग की अग्नि अंततः सबसे अधिक विनाशकारी है। इसलिए वैराग्य, आत्मचिंतन और आत्मस्वरूप की पहचान ही जीवन का वास्तविक लक्ष्य होना चाहिए।

    माही जैन धीरावत से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *