इंदौर में प्राकृत महोत्सव का शुभारंभ: आचार्य श्री सुनीलसागर ने दिया आध्यात्म, साधना और संस्कृति संरक्षण का संदेश*
इंदौर, 12 जुलाई।
आचार्य श्री सुनील सागर जी का इंदौर नगर में भव्य मंगल प्रवेश हुआ राजवाड़ा से निकली यह भव्य नगर प्रवेश शोभायात्रा उदासीन आश्रम पहुंची और वहां के ट्रस्ट द्वारा आयोजित तीन दिवसीय प्राकृत महोत्सव का शुभारंभ आचार्य श्री के मंगल सान्निध्य में भव्य वातावरण में हुआ। इस अवसर पर मध्य प्रदेश शासन के कैबिनेट मंत्री श्री कैलाश विजयवर्गीय एवं श्री तुलसी सिलावट भी गुरुदर्शन हेतु उदासीन आश्रम पहुँचे। दोनों मंत्रियों ने आचार्य श्री सुनीलसागरजी के दर्शन कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया और देशभर से प्राकृत भाषा, जैन आगम एवं जैन साहित्य के विद्वान, ब्रह्मचारी, साधक तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

अपने प्रेरणादायी उद्बोधन में आचार्य श्री ने इंदौरवासियों द्वारा मुनिराजों के प्रति व्यक्त श्रद्धा और स्वागत भाव की मुक्त कंठ से सराहना करते हुए कहा कि इंदौर की पहचान केवल उसके स्वाद से नहीं, बल्कि संतों के प्रति उसके समर्पण और संस्कारों से भी है। उन्होंने कहा कि जब मुनिराजों का संघ नगर में प्रवेश करता है तो वर्षों से बंद पड़े झरोखे खुल जाते हैं, सूनी पड़ी बालकनियाँ श्रद्धालुओं से भर जाती हैं और ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं समवसरण का साक्षात्कार हो रहा हो।

आचार्य श्री ने मुनिराजों की कठोर तपस्या का उल्लेख करते हुए कहा कि लंबी पदयात्राओं से शरीर भले ही तपकर काला पड़ जाए, किंतु आत्मा का तेज और अधिक प्रखर हो जाता है। उन्होंने गिरनार की कठोर साधना का स्मरण करते हुए कहा कि वहाँ सिंह की भाँति तप में अडिग थे, वही आज इंदौर में सावन की फुहारों की तरह धर्म की वर्षा कर रहे हैं। उन्होंने इसे प्रकृति का अद्भुत संयोग बताते हुए कहा कि मुनिराजों के नगर प्रवेश के समय सूर्य की किरणों और हल्की वर्षा ने मानो देवताओं के स्वागत का संदेश दिया। उनके अनुसार सच्ची साधना में चमत्कार करने नहीं पड़ते, चमत्कार स्वयं घटित हो जाते हैं।
आचार्य श्री ने आचार्य विद्यासागर महाराज के चरणों में सेवा का सौभाग्य मिलने का स्मरण करते हुए कहा कि उनके सान्निध्य में साधना और आध्यात्मिक जीवन का वास्तविक स्वरूप समझने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि तप, त्याग और जिनवाणी का अध्ययन ही साधक को महान बनाता है।
इस अवसर पर उदासीन आश्रम ट्रस्ट के अध्यक्ष अमित कासलीवाल ने बताया कि 12 से 14 जुलाई तक आयोजित प्राकृत महोत्सव में प्रतिदिन प्रातः 8 बजे एवं दोपहर 2 बजे प्राकृत भाषा, जैन आगम और जैन साहित्य पर विशेष विद्वत परिचर्चाएँ आयोजित की जाएँगी। देशभर के विद्वान इस महोत्सव में अपने शोध एवं विचार प्रस्तुत करेंगे।
आचार्य श्री ने प्राचीन ग्रंथों पर हो रहे सतत अनुसंधान की सराहना करते हुए कहा कि यह कार्य भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा को जीवंत बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि यहाँ से संस्कारित एवं प्रशिक्षित ब्रह्मचारी देश-विदेश में भारतीय धर्म, संस्कृति और अध्यात्म का गौरव बढ़ा रहे हैं। वास्तव में, वे समाज के सच्चे हीरे-मोती हैं।
अपने उद्बोधन में उन्होंने समाज को अपने गौरवशाली इतिहास और धरोहरों के संरक्षण का भी संदेश दिया। उन्होंने कहा कि पूर्वजों द्वारा निर्मित कीर्तिस्तंभ, गोमटगिरि, प्राचीन जिनालय और ऐतिहासिक धरोहरें केवल पत्थरों की इमारतें नहीं, बल्कि हमारी आध्यात्मिक विरासत हैं। इन्हें सुरक्षित रखना वर्तमान पीढ़ी का दायित्व है।
आचार्य श्री ने कहा कि आचार्य कुन्दकुन्द देव का आध्यात्मिक साहित्य, आचार्य आदिसागर, आचार्य शांतिसागर और आचार्य विद्यासागर जैसे महापुरुषों की साधना का आधार रहा है। यदि समाज इस साहित्य का गंभीर अध्ययन करे तो आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग सहज ही प्रशस्त हो सकता है।
उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि व्यक्ति की पहचान उसके कार्य और कर्तव्य से बनती है। समाज से केवल प्राप्त करने की अपेक्षा न रखें, बल्कि यह विचार करें कि हम समाज को क्या दे सकते हैं। यही सच्ची सेवा और धर्म है।
समापन में आचार्य श्री ने इंदौर के भव्य जिनालयों और विशाल प्रतिमाओं की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनके वैभव को देखकर ऐसा अनुभव होता है मानो स्वयं इन्द्रपुरी धरती पर उतर आई हो। उन्होंने पूर्वजों की श्रद्धा, सेवा और समर्पण को स्मरण करते हुए कहा कि उसी भावना को आगे बढ़ाना ही वर्तमान पीढ़ी का सबसे बड़ा कर्तव्य है।
माही जैन धीरावत से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

