लोहागढ़ किला: मराठा शौर्य ही नहीं, 2300 वर्ष पुरानी जैन विरासत का भी गौरवशाली प्रतीक

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लोहागढ़ किला: मराठा शौर्य ही नहीं, 2300 वर्ष पुरानी जैन विरासत का भी गौरवशाली प्रतीक

डॉ. कल्याण गंगवाल (पुणे) ने बताया— ‘णमो अरिहंताणं’ से शुरू होने वाला ब्राह्मी शिलालेख जैन इतिहास का महत्वपूर्ण प्रमाण

रामगंजमंडी।

हाल के दिनों में लोहागढ़ किला लगातार चर्चा में रहा है। अधिकांश लोग इसे मराठा वीरता और इतिहास के प्रतीक के रूप में जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोग इस तथ्य से परिचित हैं कि लोहागढ़ किला प्राचीन जैन संस्कृति और विरासत का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

पुणे से लगभग 60 किलोमीटर तथा लोनावला से 11 किलोमीटर दूर स्थित लोहागढ़ किले के दक्षिणी भाग की गुफाओं में पहली-दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का एक महत्वपूर्ण जैन ब्राह्मी शिलालेख प्राप्त हुआ है। यह शिलालेख इस क्षेत्र में जैन धर्म और जैन साधु-संघों की प्राचीन उपस्थिति का सशक्त प्रमाण माना जाता है।

साल 2019 में प्राप्त इस शिलालेख की शुरुआत “णमो अरिहंताणं” शब्दों से होती है, जिसका अर्थ है— “अरिहंतों को नमस्कार।” यह जैन परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण मंगलाचरण है और इस स्थल के जैन धार्मिक महत्व को प्रमाणित करता है।

 

 

जैन साधना का प्रमुख केंद्र था लोहागढ़

यह अभिलेख दर्शाता है कि प्राचीन काल में लोहागढ़ क्षेत्र जैन मुनियों और साधु-संघों की साधना, प्रवास एवं ठहराव का महत्वपूर्ण केंद्र था। जैन इतिहास के साथ-साथ प्राचीन व्यापारिक मार्गों के अध्ययन की दृष्टि से भी यह खोज अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

आज जिस लोहागढ़ को हम एक ऐतिहासिक दुर्ग के रूप में देखते हैं, उसकी नींव में जैन संस्कृति की हजारों वर्ष पुरानी अमिट छाप भी अंकित है।

डॉ. कल्याण गंगवाल ने साझा किए महत्वपूर्ण तथ्य

पुणे के जैन इतिहास शोधकर्ता डॉ. कल्याण गंगवाल बताते हैं कि वे कई बार लोहागढ़ की इन गुफाओं का भ्रमण कर चुके हैं। उनके अनुसार ये गुफाएँ लगभग 2300 वर्ष पुरानी हैं और यहाँ प्राप्त शिलालेख की शुरुआत “णमो अरिहंताणं” से होती है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि यह स्थान जैन मुनियों की साधना स्थली रहा है।

उन्होंने बताया कि सातवीं गुफा में भी एक महत्वपूर्ण शिलालेख मिला है, जिसमें प्राकृत, ब्राह्मी और संस्कृत का मिश्रित स्वरूप दिखाई देता है।

डॉ. गंगवाल के अनुसार पुरातत्व विभाग, पुणे के शोधकर्ताओं— डॉ. संकलिया, डॉ. प्रधान और डॉ. शोभा सहित अनेक विद्वानों ने अपने शोध में इस स्थल के महत्व को स्वीकार करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित किया है तथा यह स्थापित किया है कि हजारों वर्ष पूर्व इस क्षेत्र में जैन धर्म का प्रभाव था।

पाली गुफाएँ भी जैन विरासत का हिस्सा

डॉ. गंगवाल ने बताया कि लोहागढ़ से लगभग 20–25 किलोमीटर दूर स्थित पाली गुफाएँ भी जैन मुनियों का निवास स्थल रही हैं। वहाँ जलस्रोत, कक्ष तथा ऐसी संरचनाएँ मौजूद हैं, जिनसे प्राचीन जैन उपासना स्थल होने की संभावना व्यक्त होती है।

जैन समाज से किया आह्वान

डॉ. गंगवाल का कहना है कि लोहागढ़ क्षेत्र प्राचीन काल में जैन संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। उन्होंने बताया कि लोहागढ़ किले का वर्तमान स्वरूप लगभग 10वीं शताब्दी में विकसित हुआ, जबकि इससे कई शताब्दियों पहले यह क्षेत्र जैन साधकों और अनुयायियों का प्रमुख केंद्र था।

उन्होंने कहा कि उन्होंने निर्मल कुमार सेठी के साथ लोहागढ़ का भ्रमण किया था और बाद में भी कई बार इस स्थल का अध्ययन किया। उनका आग्रह है कि जैन समाज के प्रत्येक व्यक्ति को लोहागढ़ और पाली की इन प्राचीन गुफाओं का अवश्य दर्शन करना चाहिए, क्योंकि ये हमारी गौरवशाली सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत की जीवंत पहचान हैं।Advertisement for Sudha Amrit mustard oil showing metal tin and assorted bottles (5 L, 2 L, 1 L, 500 ml, 200 ml) with 100% pure claim and contact number 9602091568.Smiling man with folded arms in a plaid shirt on the left; sunrise over mountains and a Hindi motivational quote on the right: 'जिनने धैर्य सीख लिया, उसने जीत का रास्ता पा लिया.'Colorful poster advertising a print gallery with Buddha statues, saints, circular photo frames, a burger image, contact numbers, and an address at the bottom.

— अभिषेक जैन लुहाड़िया

रामगंजमंडी

मो. 9929747312

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