“पुण्य और पाप कभी समान नहीं हो सकते” — मुनिश्री सुधासागर महाराज का बड़ा संदेश, श्रेय छोड़ने की दी सीख
गुना।
पुण्योदय तीर्थ, बजरंगगढ़ में आयोजित विशाल धर्मसभा में राष्ट्रसंत मुनिश्री सुधासागर महाराज ने सत्य, सभ्यता, पुण्य-पाप और आत्मसाधना पर गहन आध्यात्मिक प्रवचन देते हुए श्रद्धालुओं को जीवन के मूल्यों का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने कार्यों का श्रेय स्वयं लेने के बजाय दूसरों को देना चाहिए। यही सच्ची सभ्यता है और यही जीवन को ऊंचाइयों तक पहुंचाने का मार्ग है।
मुनिश्री ने कहा कि किसी कार्य में प्रत्यक्ष योगदान न होने पर भी सम्मान और श्रेय देना सभ्यता का परिचायक है। जो व्यक्ति अपने कार्यों का श्रेय दूसरों को देता है, उसका पुण्य, सम्मान और यश स्वतः बढ़ता जाता है। अहंकार का त्याग कर विनम्रता अपनाने वाला व्यक्ति ही समाज में स्थायी प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।
अपने प्रवचन में उन्होंने कहा कि पुण्य और पाप को समान मानना जीवन की सबसे बड़ी भूल है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जैसे सोना और पीतल, दूध और शराब तथा नल का पानी और नाली का पानी समान नहीं हो सकते, वैसे ही पुण्य और पाप भी कभी एक नहीं हो सकते। विवेकपूर्ण भेद ही जीवन को सही दिशा देता है, जबकि भ्रम व्यक्ति को पतन की ओर ले जाता है।
धर्मसभा से पूर्व मुनिश्री के ससंघ सान्निध्य में भगवान का प्रथम महामस्तिकाभिषेक, महाशांतिधारा एवं नवीन वेदिकाओं पर प्रतिमा स्थापना का भव्य आयोजन हुआ। प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भैया के वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विधि-विधान से भगवान की प्रतिमाओं को नवीन वेदिकाओं पर विराजमान कराया गया। श्रद्धालुओं ने छत्र, चंवर एवं भामंडल अर्पित कर विश्व शांति और जनकल्याण की कामना की।
महासभा संयोजक विजय धुर्रा ने तीर्थ के विकास की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्षों पहले लगाया गया छोटा पौधा आज विशाल वृक्ष का रूप ले चुका है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं और सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
आयोजन के अंत में अध्यक्ष एस.के. जैन, महामंत्री प्रदीप जैन एडवोकेट, कोषाध्यक्ष संजीव बगुल्या सहित अन्य पदाधिकारियों ने आयोजन में सहयोग देने वाले प्रमुख जनों का सम्मान किया।





संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
