गाजे-बाजे संग निकले चक्रवर्तीश्रीमद जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा प्राण महामहोत्सव: राज्याभिषेक दीक्षा विधि संस्कार
उदयपुर
सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से आयोजित श्रीमद जिनेन्द्र पंचकल्याणक महा महोत्सव के अवसर पर 23 मई को चक्रवती की दिग्विजय यात्रा के वर्धमान सभागार पहुंचने पर वात्सल्य वारिधि आचार्यश्री वर्धमान सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में राज्याभिषेक व दीक्षाविधि संस्कार जयकारों के बीच किया गया। तपकल्याणक पूजा व हवन का आयोजन किया गया।
दीक्षा से संसार परिभ्रमण से छूट कारा प्राप्त कर सकते हैआचार्य श्री वर्धमान सागर जी

दीक्षा से संसार परिभ्रमण से छुटकारा पाया जाता है, दीक्षा से आमूलचूल परिवर्तन जीवन में होता है ,दीक्षा से खोए हुए भूले स्वरूप को प्राप्त किया जाता है, दीक्षा से उन्नति का मार्ग प्राप्त किया जाता है । दीक्षा से भौतिक सुख से आत्मिक सुख की और जाते हैं,यह उद्बोधन वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने पंचकल्याणक महोत्सव में श्री आदिनाथ महा मुनिराज के दीक्षा तप कल्याणक के अवसर पर धर्म सभा को संबोधित कर कहा।

ब्रह्मचारी गजू भैया राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्म सभा को संबोधित कर कहा कि धर्म तीर्थ का प्रवर्तन तीर्थंकर भगवान करते हैं ।पिछले जन्मों के सतिशय पुण्य से जो कि महापुण्य प्रकृति है ,उससे तीर्थंकर नाम कर्म प्रकृति का बंघ करते हैं, सोलह कारण भावना का चिंतन करते हैं कि दुखी प्राणियों को कैसे सुखी करें यह मंगल भावना करते हैं इसी कारण तीर्थंकर नाम प्रकृति का बंघ होता है । गर्भवती माता को कैसे संस्कारित होना चाहिए इसका जिक्र उपदेश गर्भ कल्याण के अवसर पर हमने बताया था। अभी भगवान की बाल क्रीड़ा आपने देखी ,छोटे रूप में देवता भगवान के साथ आकर खेलते हैं और बाल क्रीड़ा के माध्यम से भी सन्यास के प्रसंग उत्पन्न होते हैं। श्री आदिनाथ भगवान की आयु 84 लाखपूर्व से ज्यादा को मात्र 5 दिनों में पंचकल्याणक में आप देख रहे हैं श्री आदिनाथ भगवान ने 6 कर्मों के उपदेश देकर असि,मसि , कृषि, शिल्प ,वाणिज्य और कला का उपदेश देकर सामान्य जनता को जीवन यापन करने का मार्ग प्रशस्त किया आज दोपहर में राज्याभिषेक होगा और दीक्षा का प्रसंग भी आप देखेंगे। दीक्षा से भौतिक सुख से आत्मिक सुख की ओर जाते हैं आलोक परिसर को अयोध्या नगरी बनाया है आलोक प्रकाश देता है आलोक शिक्षा और ज्ञान से अज्ञान रूपी अंधकार दूर कर प्रकाश देता है पंच कल्याणक महोत्सव में आमोद प्रमोद क्रिया नहीं होती इससे वैराग्य का चिंतन करने का प्रयास करना चाहिए और यह भावना करना चाहिए कि तीर्थंकर भगवान ने किस प्रकार तीर्थंकर प्रकृति का बंघ किया उन्होंने लोक कल्याण के साथ आत्म कल्याण भी किया इन दृश्यों को देखकर जीवन को बदलने का पुरुषार्थ करें।
कई वर्षो के पुण्य के बाद तीर्थंकर बालक का जन्म होता है महायशमति माताजी

आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व संघस्थ शिष्या आर्यिका 105 श्री महायशमति माताजी जी ने प्रवचन में बताया कि कई वर्षो के पुण्य के बाद तीर्थंकर बालक का जन्म होता है माताजी ने सर्वोत्तम के अंतर्गत बताया कि रत्नों में चिंतामणि रत्न, वृक्ष में कल्पवृक्ष, और गाय में कामधेनु सर्वोत्तम है, इसी प्रकार गुरुओं में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सर्वोत्तम है।क्योंकि आचार्य श्री द्वारा धर्म की गंगा एवम वर्षा तत्व चर्चा उपदेश द्वारा की जा रही है।
प्रातः जिनाभिषेक एवं नित्यार्जन और बाल क्रीडा का आयोजन किया गया।
दोपहर को युवराज श्री आदिनाथ जी का राजा पद पर राज्याभिषेक होता है।83 लाख वर्ष राज्य के बाद जब 1 लाख वर्ष शेष रहते हैं तब निलांजना के नृत्य से वैराग्य होता है भरत और बाहुबली को राज्य देते हैं। लोकांतीक देव वैराग्य की अनुमोदना कर वन ले जाते हैं।
इस अवसर पर मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने प्रवचन में बताया मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने 5 कल्याणक का 5 इंद्रिय से अद्भुत संयोग बताया। गर्भ से रसना, जन्म से स्पर्श,दीक्षा तप से चक्षु,ज्ञान से कर्ण और घाण और मोक्ष कल्याणक से मन रूपी मोह नष्ट होता है। मुनि श्री ने तीर्थ के 2 भेद में धर्म तीर्थ तीर्थंकर का,और दान तीर्थ श्रावक का होता है।दोनो एक दूसरे के पूरक है।
इस वैराग्य के अवसर पर आचार्य श्री ने सूत्र दिया वैराग्य से मोह को नष्ट कर आप भी मोक्ष पथिक हो सकते हैं। शाम को श्री जी की आरती का सौभाग्य भी माता पिता श्री रोशनलाल जी गदावत परिवार को प्राप्त हुआ।
भगवान के दीक्षा कल्याणक के अवसर पर माता पिता श्रीमती लक्ष्मी देवी रोशन लाल जी गदावत उदयपुर ने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार किया। शाम को श्री एलजी की आरती के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ।
राजेश पंचोलिया वात्सल्य भक्त परिवार से प्राप्त जानकारी के साथ अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
