डिनर के बाद सिटिंग रूम में अकेले इंदिरा गांधी व जुल्फिकार अली भुट्टो- शिमला समझौते के आखिरी घंटों की कहानी
भारत-पाकिस्तान के बीच 1972 में 2 जुलाई को हुआ शिमला समझौता आज भी दोनों देशों के बीच शांति का मजबूत आधार है। वह समझौता पाकिस्तान के नए राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो और भारत की मजबूत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीच हुआ था। भुट्टो अपनी बेटी बेनजीर को भी लेकर आए थे। बेनजीर ने शिमला यात्रा का जो ब्योरा अपनी आत्मकथा ‘डॉटर ऑफ डेस्टिनी’ में दर्ज किया है, उससे समझौते की ‘इनसाइड स्टोरी’ तो पता चलती ही है, भारतीय मीडिया का भी एक चेहरा दिखता है।
भारत से 1971 की लड़ाई में ढाका को खो देने के चार दिन बाद 20 दिसंबर, 1971 को याहया खान को इस्तीफा देना पड़ा और जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने। उनकी बेटी बेनजीर भुट्टो ने अपनी आत्मकथा ‘डॉटर ऑफ डेस्टिनी’ में लिखा है कि इसके बाद हार्वर्ड में वह पाकिस्तानी राष्ट्रपति की बेटी के रूप में जानी जाने लगी थीं, लेकिन उन्होंने यह भी लिखा है कि उनके पिता के लिए यह गौरवशाली ओहदा मुल्क के भीषण अपमान और भारी कीमत चुकाने के बाद आया था।
भुट्टो लिखती हैं, ‘दो हफ्ते की लड़ाई में हमारी एक-चौथाई वायु सेना और आधी नौसेना बर्बाद हो गई थी। हमारा खजाना खाली हो चुका था। हमारे हाथ से न केवल पूर्वी पाकिस्तान निकल गया था, बल्कि भारतीय सेना ने पश्चिम में भी हमारी 5000 वर्ग मील जमीन पर कब्जा कर लिया था और हमारे 93 हजार लोगों को युद्धबंदी बना लिया था। 1947 में मोहम्मद अली जिन्ना ने जिस रूप में पाकिस्तान को बनवाया था, वह बांग्लादेश बनने के साथ खत्म चुका था। अनेक लोगों का मानना था कि पाकिस्तान का वजूद नहीं बचेगा।’
