मुनि ससंघ का बड़ोदिया में प्रवेश, आचार्य विद्यासागर का 59वां दीक्षा दिवस मनायाभक्ति में भाव का महत्व है: प्रणम्य सागर महाराज  

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मुनि ससंघ का बड़ोदिया में प्रवेश, आचार्य विद्यासागर का 59वां दीक्षा दिवस मनायाभक्ति में भाव का महत्व है: प्रणम्य सागर महाराज

बड़ोदिया

 

बोरवट से विहार कर अर्हम योग प्रणेता मुनिश्री 108 प्रणम्य सागर महाराज ससंघ का मंगलवार सुबह बड़ोदिया में प्रवेश हुआ। श्रद्धालुओं ने गाजे-बाजे के साथ स्वागत किया। नाचते-गाते भक्ति करते संघ को श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर लाया गया। यहां दर्शन-पूजन के बाद आचार्य विद्यासागर महाराज का 59वां दीक्षा दिवस श्रद्धा से मनाया गया।

 

 

धर्मसभा अर्हम योग प्रणेता मुनिश्री 108प्रणम्य सागर महाराज ने भक्ति, गुरु-निष्ठा, साधना का संदेश दिया। मुनि ने कहा कि शबरी ने भगवान श्रीराम के वर्षों के इंतजार को नहीं देखा, बल्कि अपने अटूट भाव साधे।

 

निष्कलंक प्रेम, समर्पण ने भगवान श्रीराम को उसके द्वार तक आने को विवश किया। भक्ति में समय नहीं, भाव का महत्व होता है। मनुष्य को अवसर देखकर भक्ति नहीं करनी चाहिए। अक्षुण्ण भाव से भक्ति करनी चाहिए। कई लोग गुरु का सान्निध्य नगर में रहने तक ही भक्ति करते हैं। गुरु के विहार के बाद उत्साह खत्म हो जाता है। यह सच्ची भक्ति नहीं है। गुरु के नगर प्रवेश पर सबसे आगे रहना चाहिए। विहार के समय सबसे पीछे रहना चाहिए। यही वास्तविक गुरु-भक्ति है।

 

 

 

 

मुनि ने कहा कि आचार्य विद्यासागर ने शिष्यों को कठिन तप, त्याग, सहनशीलता का अभ्यास कराया। भीषण गर्मी में साधु-संघ को कुण्डलपुर जैसे क्षेत्रों में ले जाते थे। वहां देर रात तक गर्म हवाएं चलती थीं। शीतकाल में अमरकंटक जैसे अत्यंत ठंडे स्थानों पर विहार कराया जाता था। शिष्यों को सिखाया, मौसम धर्म, साधना में बाधा नहीं बनना चाहिए। इसी शिक्षा से आज साधु-संघ न दूरी देखते हैं न पैरों के छालों की चिंता करते हैं। धर्मसभा में बड़ोदिया जैन समाज ने मुनि प्रणम्य सागर को आगामी चातुर्मास के लिए श्रीफल भेंट किया।

 

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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