भव्य मंगल प्रवेश से धर्ममय हुआ झाबुआ, आचार्य श्री सुनीलसागर महाराज ने दिया मर्यादा, न्याय और संस्कारों का संदेश

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भव्य मंगल प्रवेश से धर्ममय हुआ झाबुआ, आचार्य श्री सुनीलसागर महाराज ने दिया मर्यादा, न्याय और संस्कारों का संदेश

बैंड-बाजों, जयघोष और पुष्पवर्षा के बीच हुआ ऐतिहासिक स्वागत; धर्मसभा में रामायण, महाभारत और गीता के माध्यम से जीवन मूल्यों पर किया प्रेरक उद्बोधन।

झाबुआ (मध्यप्रदेश), 27 जून।

झाबुआ नगर शुक्रवार को धर्म, श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास से सराबोर हो उठा, जब परम पूज्य प्राकृताचार्य, राष्ट्र गौरव, चतुर्थ पट्टाधीश आचार्य भगवंत 108 श्री सुनीलसागर जी महाराज ससंघ का नगर में भव्य एवं ऐतिहासिक मंगल प्रवेश हुआ। बैंड-बाजों, जयघोष और भक्तों की अपार श्रद्धा के बीच नगरवासियों ने जगह-जगह पुष्पवर्षा कर आचार्य श्री का आत्मीय स्वागत किया। पूरे शहर में भक्ति और उत्साह का अनुपम वातावरण देखने को मिला।

 

 

मंगल प्रवेश के उपरांत आयोजित विशाल धर्मसभा में आचार्य श्री ने कहा, “झाबुआ की घाटियाँ आज मुस्कुरा रही हैं, धर्म और संस्कारों की खुशबू चारों ओर बिखर रही है।” उनके इन शब्दों ने उपस्थित श्रद्धालुओं के मन को भाव-विभोर कर दिया।

अपने ओजस्वी प्रवचन में आचार्य श्री ने कहा कि रामायण केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा है। भगवान श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और जो व्यक्ति मर्यादा का पालन करता है, वही श्रेष्ठ जीवन की ओर अग्रसर होता है। उन्होंने कहा कि धर्म की सच्ची आराधना करने वाला व्यक्ति ही वास्तव में सर्वोत्तम बनता है।

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उन्होंने कहा कि रामायण परिवार, त्याग, प्रेम और कर्तव्य की शिक्षा देती है, जबकि महाभारत यह बताती है कि जीवन में किन गलतियों से बचना चाहिए। किसी का अधिकार छीनना, अन्याय करना तथा पद और प्रतिष्ठा का दुरुपयोग अंततः विनाश का कारण बनता है।

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आचार्य श्री ने गीता और जिनवाणी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गीता जीवन जीने की कला सिखाती है, जबकि जिनवाणी जीवन को सार्थक बनाकर मोक्षमार्ग की ओर प्रेरित करती है।

उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति दूसरों के अधिकारों का हनन करता है या किसी के साथ अन्याय करता है, उसे एक दिन उसके दुष्परिणाम अवश्य भुगतने पड़ते हैं। “दूसरों के लिए गड्ढा खोदने वाला कई बार स्वयं उसी में गिर जाता है,” इसलिए सदैव न्याय, सद्भाव और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए।

समाज के जिम्मेदार पदों पर आसीन लोगों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि यदि समाज ने सम्मान और दायित्व दिया है तो उसका उपयोग जनकल्याण और समाज सेवा के लिए होना चाहिए। उन्होंने वृद्ध माता-पिता की उपेक्षा पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जिन्होंने हमें पाल-पोसकर बड़ा किया, उन्हें वृद्धाश्रम भेजना कृतज्ञता नहीं, बल्कि कृतघ्नता का प्रतीक है।

अपने प्रेरणादायी उद्बोधन के समापन पर आचार्य श्री ने कहा, “छोटी सोच इंसान को कभी आगे नहीं बढ़ने देती। मंज़िल उसी को मिलती है जो रास्तों से दोस्ती कर लेता है और जीत उसी की होती है जो हार से सीख लेता है।”

आचार्य श्री के मंगल प्रवेश और प्रेरक प्रवचन से झाबुआ नगर पूरी तरह धर्ममय वातावरण में रंग गया। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने धर्म, संस्कार, मर्यादा और सदाचार के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

(स्रोत: आर्यिका 105 श्री सम्पूर्णमति माताजी से प्राप्त आलेख | संकलन: माही धीरावत एवं अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी)

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