जैन धर्म की मर्यादा के विपरीत कथन : मोर पंखों की पिच्छिका हेतु 15 लाख मोरों की हत्या का आरोप बेबुनियाद ही नहीं, अपितु मस्तिष्क के दिवालियापन की निशानी*

धर्म

*जैन धर्म की मर्यादा के विपरीत कथन : मोर पंखों की पिच्छिका हेतु 15 लाख मोरों की हत्या का आरोप बेबुनियाद ही नहीं, अपितु मस्तिष्क के दिवालियापन की निशानी*

घोर अज्ञानता का परिचायक है अथवा टीआरपी बढ़ाने का कुत्सित प्रयास*

पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी जी द्वारा 17 जून को दिल्ली स्थित लाल किले के सामने जैन मंदिर में मुनि श्री सौरभ सागर जी महाराज के समक्ष यह कहना कि जैन साधुओं की पिच्छिका के लिए लाखों मोरों की हत्या की जाती है, अत्यंत निंदनीय, तथ्यहीन एवं जैन धर्म की मूल अवधारणा के सर्वथा विपरीत कथन है। आश्चर्य का विषय यह है कि लगभग एक दशक पूर्व भी वे इसी प्रकार का आरोप लगा चुकी हैं, जबकि आज तक इस कथन के समर्थन में कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।

 

मेरी दृष्टि में ऐसे कथनों की कोई तथ्यात्मक अहमियत नहीं है। यह या तो विषय के प्रति घोर अज्ञानता का परिचायक है अथवा फिर स्वयं को चर्चा में बनाए रखने के लिए टीआरपी प्राप्त करने का एक कुत्सित प्रयास मात्र है। जिस धर्म का मूलाधार ही “अहिंसा परमो धर्मः” है, उस धर्म पर हिंसा का आरोप लगाना स्वयं में एक बड़ा विरोधाभास है।

 

जैन धर्म और अहिंसा का अद्वितीय सिद्धांत

जैन धर्म विश्व का वह महानतम दर्शन है जिसने सूक्ष्मतम जीवों तक की रक्षा का संदेश दिया है। यहाँ केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय और वनस्पतिकाय जीवों तक की रक्षा की भावना का प्रतिपादन किया गया है।

 

जैन साधु अपने प्रत्येक कार्य में जीवदया का विशेष ध्यान रखते हैं। वे रात्रि में भोजन नहीं करते, पैदल विहार करते हैं, भूमि को देखकर कदम रखते हैं, पानी छानकर ग्रहण करते हैं तथा अपने जीवन के प्रत्येक क्षण में जीवों की रक्षा का प्रयास करते हैं। ऐसे धर्म के साधुओं पर मोरों की हत्या का आरोप लगाना वस्तुतः अहिंसा के विश्वव्यापी संदेश का अपमान है।

 

*पिच्छिका क्या है और उसका महत्व*

जैन दिगंबर मुनियों के हाथ में रहने वाली पिच्छिका केवल मोरपंखों का गुच्छा नहीं, बल्कि करुणा, जीवदया और अहिंसा का जीवंत प्रतीक है। मुनिराज किसी स्थान पर बैठने, शास्त्र रखने अथवा अपने समीप उपस्थित सूक्ष्म जीवों को बिना कष्ट पहुँचाए धीरे से हटाने के लिए पिच्छिका का उपयोग करते हैं। इसका उद्देश्य किसी जीव को मारना नहीं, बल्कि उसकी रक्षा करना है।

 

पिच्छिका जैन साधु की निरंतर जागरूकता का प्रतीक है कि उनके द्वारा अनजाने में भी किसी जीव की हिंसा न हो जाए। यह करुणा और संवेदनशीलता का वह प्रतीक है जिसकी तुलना विश्व के किसी अन्य संन्यास परंपरा में दुर्लभ है।

*मोर पंख कहाँ से प्राप्त होते हैं?*

यह तथ्य सर्वविदित है कि मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है और प्रत्येक वर्ष प्राकृतिक रूप से अपने पुराने पंखों का त्याग करता है। वर्षा ऋतु के पश्चात् मोर स्वयं ही अपने पंख गिरा देते हैं,सावन मास के अंतिम व भाद्र मास के प्रारंभिक पखवाड़े में लगभग यह क्रिया होती है। मेरे स्वयं के द्वारा अपनी टीम के साथ ग्रामीण इलाकों से मोर पंखों को एकत्रित कर सन्तों के पास भेजा गया था। जिन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में सहज रूप से एकत्रित किया जाता है।

 

जैन परंपरा में पिच्छिका के लिए केवल उन्हीं प्राकृतिक रूप से गिरे हुए मोरपंखों का उपयोग किया जाता है। किसी भी प्रकार की हिंसा करके, किसी पक्षी को कष्ट देकर अथवा उसकी हत्या करके पंख प्राप्त करना जैन साधु मर्यादा के सर्वथा विपरीत है।

 

वास्तव में यदि किसी जीव की हिंसा करके प्राप्त वस्तु से निर्मित पिच्छिका किसी मुनिराज को प्रदान की जाए तो वह जैन साधु मर्यादा और अहिंसा सिद्धांत दोनों के प्रतिकूल होगी।

*जैन संत : अहिंसा की चलती-फिरती प्रतिमूर्ति*

जैन संत अपने संपूर्ण जीवन में त्याग, तप, संयम और अहिंसा की चरम साधना करते हैं। वे वाहन का उपयोग नहीं करते, संग्रह नहीं करते, जीवों को कष्ट न पहुँचे इसलिए अत्यंत सावधानी से विहार करते हैं तथा संसार को करुणा और सह-अस्तित्व का संदेश देते हैं।

जिन संतों का संपूर्ण जीवन ही जीवों की रक्षा के लिए समर्पित हो, उन पर लाखों मोरों की हत्या का आरोप लगाना न केवल तथ्यहीन है, बल्कि करोड़ों जैन श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला भी है।

किसी भी सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्ति को किसी धर्म और उसकी परंपराओं पर टिप्पणी करने से पूर्व उसके सिद्धांतों, इतिहास और वास्तविक तथ्यों का गंभीर अध्ययन अवश्य करना चाहिए। बिना तथ्य और प्रमाण के दिए गए ऐसे वक्तव्य सामाजिक सद्भाव को आघात पहुँचाते हैं और समाज में अनावश्यक भ्रम उत्पन्न करते हैं।

जैन धर्म की पिच्छिका हिंसा की नहीं, बल्कि अहिंसा, करुणा, जीवदया और समस्त प्राणियों के प्रति संवेदनशीलता की प्रतीक है। इसलिए पिच्छिका को मोरों की हत्या से जोड़ना न केवल निराधार है, बल्कि जैन दर्शन की आत्मा को समझने में पूर्णतः असफल रहने का प्रमाण भी है।

– संजय जैन बड़जात्या, कामवन

(स्वतंत्र लेखक एवं सामाजिक चिंतक)

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