आत्मजागरण ही मनुष्य के जीवन का वास्तविक लक्ष्य : मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज
मधुबन
मनुष्य वर्षों तक अज्ञान और मोह की निद्रा में रह सकता है, लेकिन जो वास्तव में जाग जाता है, वह एक क्षण भी प्रमाद में नहीं बिताता। यह बात मुनि प्रमाण सागर ने शनिवार को मधुबन में प्रमाणिक समूह की पाठशालाओं का संचालन करने वाले कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कही।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को बाहरी नहीं, बल्कि आत्मजागरण की आवश्यकता है। जीवन का परम लक्ष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना और उसी दिशा में आगे बढ़ना है। अधिकांश लोग बाहर से जागृत दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर से अज्ञान और मोह में डूबे रहते हैं। वास्तविक जागृति तब होती है, जब व्यक्ति अपने शुद्ध आत्मस्वरूप का बोध कर लेता है।

मुनिsgrw प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि शरीर की शुद्धि अपेक्षाकृत सरल है, जबकि आत्मा की शुद्धि कठिन साधना का विषय है। व्यक्ति को हर परिस्थिति में यह भावना बनाए रखनी चाहिए कि वह शुद्ध आत्मा है। आत्मबोध वाला व्यक्ति लाभ-हानि, संयोग-वियोगऔर अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में भी स्थिर रहता है।

उन्होंने जीवन परिवर्तन का सूत्र बताते हुए कहा, जानो, जागो और बदलो। पहले स्वयं को पहचानें, फिर आत्मजागरण करें और उसके बाद अपने भीतर के विकारों को दूर करने का प्रयास करें। चिंतन, चरित्र, आचार और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन ही आत्मविकास का मार्ग है।


इस दौरान गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर 21 जून को सुबह 8 बजे से गुणायतन परिसर में भावनायोग कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।
मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि जैन साधना में भावना का विशेष महत्व है। शुद्धात्म भावना के निरंतर अभ्यास से चेतना में सकारात्मक संस्कार विकसित होते हैं और राग, द्वेष, मोह, क्रोध व लोभ जैसे विकार स्वतः कमजोर पड़ने लगते हैं। भावनायोग सभी कषायों और विकारों से मुक्ति का सरल माध्यम है।
कार्यक्रम का संचालन मुनि संधान पद सागर ने किया। इस अवसर पर संघस्थ मुनिराज भी उपस्थित रहे।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
