श्रुत पंचमी: ताड़पत्र से डिजिटल युग तक जिनवाणी की अविरल यात्रा*लेखक- मनोज कुमार जैन बांकलीवाल

धर्म

*श्रुत पंचमी: ताड़पत्र से डिजिटल युग तक जिनवाणी की अविरल यात्रा*लेखक- मनोज कुमार जैन बांकलीवाल

 

आज दिगम्बर जैन समाज में श्रुत पंचमी का पावन पर्व मनाया जाता है। यह केवल शास्त्र-पूजन का दिन नहीं, बल्कि जिनवाणी के संरक्षण और संवर्धन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है।

 

भगवान महावीर के समय और उसके बाद कई शताब्दियों तक जिनवाणी लिखी नहीं जाती थी। गुरुओं से शिष्यों तक श्रुत परम्परा द्वारा ज्ञान का संचार होता था। स्मरण शक्ति इतनी अद्भुत थी कि विशाल आगम और सिद्धांत कंठस्थ रखे जाते थे।

समय के साथ जब स्मरण परम्परा कमजोर होने लगी, तब आचार्यों ने जिनवाणी को ताड़पत्रों पर लिखकर सुरक्षित करना प्रारम्भ किया। सदियों तक यही माध्यम रहा।

 

इसके बाद कागज़ का युग आया, जिससे ग्रंथों का लेखन और संरक्षण अपेक्षाकृत सरल हुआ। फिर मुद्रण (Printing Press) युग ने जिनवाणी को हजारों-लाखों श्रद्धालुओं तक पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त किया। प्रारम्भ में समाज ने इसे धीरे-धीरे अपनाया, परन्तु बाद में असंख्य जैन ग्रंथ मुद्रित होकर जन-जन तक पहुँचे।

 

आज हम डिजिटल युग में हैं। हजारों दुर्लभ जैन ग्रंथ, सिद्धांत, टीकाएँ और शोध सामग्री अब घर बैठे मोबाइल और कंप्यूटर पर उपलब्ध हैं। जिनवाणी अब पुस्तकालयों की अलमारियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि विश्वभर के जिज्ञासुओं की उंगलियों पर है।

 

कुछ महत्वपूर्ण डिजिटल जैन ज्ञान-स्रोत:

 

• Jain Granth Digital Library⁠�

• Jain Quantum Digital Library⁠�

• Jain eLibrary⁠�

• Atmadharma Website⁠�

• Jainpedia⁠�

 

श्रुत पंचमी हमें स्मरण कराती है कि जिन आचार्यों, मुनियों, पण्डितों, लेखकों, मुद्रकों और आधुनिक तकनीकी विशेषज्ञों ने हजारों वर्षों तक जिनवाणी को सुरक्षित रखा, हम उनके ऋणी हैं।

 

आइए, आज केवल शास्त्र-पूजन ही नहीं, बल्कि शास्त्र-अध्ययन का भी संकल्प लें।“श्रुत ज्ञान ही सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र की ओर ले जाने वाला प्रकाश स्तम्भ है।”

 

 

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