संतोष और संयम से ही मिलेगा जीवन में वास्तविक सुख : आचार्य श्री सुनील सागर महाराज

धर्म

संतोष और संयम से ही मिलेगा जीवन में वास्तविक सुख : आचार्य श्री सुनील सागर महाराज 

धर्मसभा में परम पूज्य आचार्य श्री 108 सुनील सागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य को संसार की बुराइयों और दूसरों के दोषों को देखकर निराश नहीं होना चाहिए। कबीरदास जी के दोहों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों का फल स्वयं भोगता है, इसलिए दूसरों के आचरण से दुखी होने के बजाय अपने आत्मकल्याण पर ध्यान देना चाहिए।

 

 

आचार्य श्री ने कबीरदास जी के प्रसिद्ध दोहे “कबीरा तेरी झोपड़ी गलकट्टन के पास, जो करै सो भरै, तू क्यों भए उदास” की व्याख्या करते हुए कहा कि संसार में हिंसा, अन्याय और अधर्म देखकर व्यथित होने के स्थान पर यह समझना चाहिए कि प्रत्येक जीव अपने कर्मों का फल भोगता है। हमारा कर्तव्य स्वयं को धर्ममार्ग पर स्थिर रखना है।

उन्होंने दूसरे दोहे “मक्खी गुड़ में गड़ी रहे…” का उल्लेख करते हुए कहा कि अत्यधिक लालच मनुष्य को दुख और क्लेश की ओर ले जाता है। भोग-विलास, पद, प्रतिष्ठा और अधिकार की असीम चाह अंततः शांति को नष्ट कर देती है। इसलिए संयमित जीवन और संतोष की भावना ही वास्तविक सुख का आधार है।

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आचार्य श्री ने सगुण और निर्गुण भक्ति की विवेचना करते हुए बताया कि सगुण भक्ति अरिहंत परमात्मा के स्वरूप एवं गुणों के आधार पर की जाने वाली भक्ति है, जबकि निर्गुण भक्ति सिद्ध परमात्मा के शुद्ध, निराकार और वीतराग स्वरूप का चिंतन है। उन्होंने कहा कि तत्वज्ञान जहां से भी प्राप्त हो, उसे ग्रहण करना चाहिए।

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कबीरदास जी के प्रसिद्ध दोहे “जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान” का उल्लेख करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि साधु की जाति, क्षेत्र, परंपरा या बाहरी स्वरूप को देखने के बजाय उसके ज्ञान और आत्मकल्याणकारी उपदेशों को महत्व देना चाहिए। साधना और आत्मशुद्धि के मार्ग पर चलने के लिए किसी बाहरी मान्यता या लाइसेंस की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि जिनवाणी में बताए गए सिद्धांतों का पालन ही वास्तविक प्रगति का आधार है।

 

आचार्य श्री ने कहा कि आत्मा का वास्तविक स्वभाव ज्ञानमय है। क्रोध, मान, माया और लोभ आत्मा के स्वभाव नहीं, बल्कि कर्मजनित विकार हैं। जब जीव अपने ज्ञानस्वरूप में स्थित होता है, तभी कर्मों की निर्जरा होती है और मोक्षमार्ग प्रशस्त होता है। उन्होंने कहा कि गुण और गुणी अलग नहीं हैं, जिस प्रकार शक्कर और मिठास अभिन्न हैं, उसी प्रकार आत्मा और ज्ञान भी अभिन्न हैं।

 

उन्होंने सभी श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर विद्यमान ज्ञान, शांति और परमात्मस्वरूप की पहचान करे तथा ऐसा जीवन जिए जिससे किसी भी जीव को कष्ट न पहुंचे। शाकाहार, सदाचार, ब्रह्मचर्य, संयम और व्रतों के पालन से आत्मशुद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

 संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

 

धर्मसभा के अंत में आचार्य श्री ने मंगल भावना व्यक्त करते हुए कहा कि प्रत्येक जीव अपनी पवित्र आत्मिक अवस्था को प्राप्त करे, कर्मों के बंधनों से मुक्त होकर आत्मा से परमात्मा बनने की दिशा में अग्रसर हो तथा समस्त प्राणीमात्र के प्रति करुणा और अहिंसा का भाव रखे।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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