आत्मविजय ही महावीरत्व का मार्ग, अहिंसा और वीतरागता से होगा कल्याण : आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज

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आत्मविजय ही महावीरत्व का मार्ग, अहिंसा और वीतरागता से होगा कल्याण : आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज

परम पूज्य आचार्य श्री108 सुनील सागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जो व्यक्ति स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही वास्तविक अर्थों में महावीर कहलाता है। संसार को जीत लेने वाला वीर हो सकता है, किंतु अपनी इंद्रियों, वासनाओं और कषायों को जीतने वाला महावीर बनता है। उन्होंने कहा कि भगवान ऋषभदेव से लेकर भगवान महावीर तक सभी तीर्थंकरों ने आत्मविजय, तप और त्याग का मार्ग दिखाया है।

 

आचार्य श्री ने कहा कि बुद्धिमान वही है जो सद्धर्म का सेवन करे, अहिंसा, दया और करुणा के मार्ग पर चले तथा अपने आचरण से किसी भी जीव को कष्ट न पहुंचाए। उन्होंने कहा कि आत्मा ही अहिंसा है और जब तक जीव अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित रहता है, तब तक अहिंसक रहता है। राग, द्वेष, क्रोध और मोह में पड़ते ही हिंसा प्रारंभ हो जाती है।

 

 

जय जिनेंद्र” केवल एक अभिवादन नहीं, बल्कि उन सभी महापुरुषों की वंदना है आचार्य श्री

आचार्य श्री ने जय जिनेंद्र” के विषय में बताया कि “जय जिनेंद्र” केवल एक अभिवादन नहीं, बल्कि उन सभी महापुरुषों की वंदना है जिन्होंने अपने भीतर के विकारों पर विजय प्राप्त की है। जैन वह है जो जीतने वालों के मार्ग को स्वीकार करता है और आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर होता है।Advertisement for Sudha Amrit mustard oil showing metal tin and assorted bottles (5 L, 2 L, 1 L, 500 ml, 200 ml) with 100% pure claim and contact number 9602091568.

 

 

 

साधु की पहचान साधनों से साधना से है

आचार्य ने साधु के विषय में बताया आचार्य श्री ने कहा कि साधु की पहचान साधनों से नहीं, साधना से होती है। श्रद्धा और भक्ति जहां होती है, वहां सीमित सुविधाएं भी आनंद प्रदान करती हैं। उन्होंने गिरनार की तपस्थली का स्मरण करते हुए कहा कि प्राकृतिक और आध्यात्मिक वातावरण साधना को विशेष ऊर्जा प्रदान करता है।Smiling man with folded arms in a plaid shirt on the left; sunrise over mountains and a Hindi motivational quote on the right: 'जिनने धैर्य सीख लिया, उसने जीत का रास्ता पा लिया.'

 

 

प्रवचन में उन्होंने महापुरुषों को किसी एक समाज या वर्ग तक सीमित न मानने का संदेश देते हुए कहा कि भगवान महावीर, भगवान राम, भगवान कृष्ण जैसे महापुरुष सम्पूर्ण मानवता के लिए प्रेरणास्रोत हैं। आवश्यकता केवल उन्हें मानने की नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को जीवन में उतारने की है।

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आचार्य श्री ने वीतरागता, वैराग्य और आत्मचिंतन का महत्व बताते हुए कहा कि मन को निश्चल कर आत्मा में स्थित होना ही सच्ची साधना है। अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में किया जा सकता है। उन्होंने युवाओं को संयम, ब्रह्मचर्य और साधना के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।

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गुरु परंपरा का स्मरण करते हुए आचार्य श्री नेआचार्य श्री आदिसागर जी महाराज,आचार्य श्री महावीरकीर्ति जी,आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज एवं तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सनमति सागर जी महाराज की महान तपस्या एवं त्याग का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कठोर तप, स्वाध्याय और आत्मसाधना ही आत्मा को पवित्र बनाकर परमात्मा स्वरूप की प्राप्ति कराते हैं।

 

 

अंत में आचार्य श्री ने सभी जीवों के मंगल और कल्याण की भावना व्यक्त करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अहिंसा, करुणा और आत्मकल्याण के मार्ग पर चले, यही मानव जीवन की सार्थकता है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

 

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