“धर्म को धारण करने से जीवन में आती है स्थिरता : राष्ट्रीय संत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज”
(गिरीडीह)
गुणायतन मधुबन मेँ तीन दिवसीय स्वधर्म संस्कार शिविर में जिसमेँ ज्यादातर उडिया भाषा के श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि धर्म का वास्तविक आरंभ व्यसनों और अनाचारों के त्याग से शुरु होता है। मनुष्य चाहे पूजा-पाठ, व्रत, दान और सेवा जैसे अनेक धार्मिक कार्य करे, किन्तु यदि उसके जीवन में व्यसन मौजूद हैं तो वह धर्ममार्ग पर दृढ़ता से आगे नहीं बढ़ सकता।
उन्होंने कहा कि मांसभक्षण, शिकार, चोरी, वेश्यागमन, परस्त्रीगमन, जुआ तथा नशा जैसे व्यसन मनुष्य के जीवन को कलंकित कर उसे पतन की ओर ले जाते हैं।
मुनिश्री ने कहा कि समाज का यह महान सौभाग्य है कि उसे ऐसी पवित्र परंपरा प्राप्त हुई है, जहाँ पीढ़ियों से अहिंसा, संयम और सदाचार का पालन होता आया है। अनेक परिवारों में पूर्वजों से लेकर वर्तमान पीढ़ी तक मांसाहार का स्पर्श भी नहीं हुआ। यह केवल सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि धर्म के जीवंत संस्कारों का परिणाम है। धर्म के प्रभाव से ही व्यक्ति के जीवन में शुद्धता, संवेदनशीलता और मर्यादा का विकास होता है।
उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक स्वरूप व्यक्ति के आचरण और व्यवहार में दिखाई देता है। जिस परिवार और समाज में धर्म जीवित रहता है, वहाँ संस्कार, मर्यादा और संयम सुरक्षित रहते हैं। जो धर्म को धारण करता है, उसके जीवन में स्थिरता और ठहराव आता है, जबकि धर्म से विमुख होने पर भटकाव उत्पन्न होता है।

मुनिश्री ने कहा कि प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष किसी भी रूप में मांसाहार और अभक्ष्य पदार्थों का सेवन नहीं होना चाहिए। अहिंसा, शुद्ध आहार और संयम हमारी पहचान, हमारी संस्कृति और हमारी आध्यात्मिक विरासत हैं। इन मूल्यों को किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं होने देना चाहिए।उन्होंने कहा कि मदिरापान, नशा, पर स्त्रीगमन और व्यभिचार जैसी प्रवृत्तियाँ व्यक्ति को नैतिक पतन की ओर ले जाती हैं। ऐसे दुर्व्यसनों में फँसकर अनेक लोग अपना जीवन स्वयं नष्ट कर लेते हैं और अंततः उन्हें उसके दुष्परिणाम भी भुगतने पड़ते हैं।

मुनिश्री ने कहा कि व्यसन मनुष्य की विवेक शक्ति को नष्ट कर देते हैं। विशेष रूप से शराब, गांजा, चरस, अफीम, भांग तथा वर्तमान समय में बढ़ता ड्रग्स का प्रचलन युवाओं के जीवन को बर्बाद कर रहा है। इनके कारण केवल व्यक्ति ही नहीं, बल्कि पूरा परिवार संकट और दुख का सामना करता है। शास्त्रों में भी व्यसन को पतन का प्रमुख कारण बताया गया है। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति के जीवन में किसी भी प्रकार का नशा है, उसका धर्म क्षेत्र में वास्तविक प्रवेश अभी नहीं हुआ है। उन्होंने कहा नशा व्यक्ति के मन और मस्तिष्क पर नियंत्रण समाप्त कर देता है, जिससे वह अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों से विमुख होकर अनुचित आचरण करने लगता है। अनेक अपराधों के पीछे भी नशाखोरी एक प्रमुख कारण होती है।
उपस्थित युवाओं एवं श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुए मुनिश्री ने कहा कि यदि जीवन में किसी भी प्रकार का व्यसन है तो उसे आज और अभी छोड़ने का संकल्प लेना चाहिए। केवल शराब ही नहीं, बल्कि सिगरेट, तंबाकू, गुटखा और अन्य सभी प्रकार के नशे भी जीवन के विनाश का कारण हैं। धर्ममय और सफल जीवन के लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपने जीवन को हर प्रकार के व्यसन से मुक्त रखे।
गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि जैन संघ पुणे द्वारा उन सराक बंधुओं के लिए, जो पिछड़े क्षेत्रों में निवास करते हुए भी जैन धर्म का पालन कर रहे हैं, गुणायतन एवं श्री सेवायतन परिवार के सहयोग से तीन दिवसीय स्वधर्म जन जागरण संस्कार शिविर का आयोजन किया गया है जिसमें लगभग तीन सौ से अधिक सराक क्षेत्र से आये बंधू भाग ले रहे है मुनि श्री ने प्रातः काल भावना योग कराया एवं भगवान काअभिषेक एवं शांति धारा मुनिश्री के मुखार विंद से संपन्न हुई।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
