ब्रह्ममुहूर्त में जागरण, योग और जिनवाणी का स्वाध्याय जीवन को बनाता है श्रेष्ठ: मुनि श्री उद्यमसागर महाराज

धर्म

ब्रह्ममुहूर्त में जागरण, योग और जिनवाणी का स्वाध्याय जीवन को बनाता है श्रेष्ठ: मुनि श्री उद्यमसागर महाराज
विदिशा।
जीवन को स्वस्थ, संतुलित और उत्कृष्ट बनाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को ब्रह्ममुहूर्त में जागने तथा प्रातःकालीन भ्रमण की आदत विकसित करनी चाहिए। प्रातःकाल की शुद्ध एवं ताजी वायु शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है और अनेक रोगों से बचाने में सहायक होती है। यह प्रेरणादायी उद्बोधन मुनि श्री उद्यमसागर महाराज ने धर्मसभा में व्यक्त किए।

 

 

प्रवक्ता अविनाश जैन विद्या वाणी ने बताया मुनि श्री किला अंदर स्थित बड़े जैन मंदिर में विराजमान है मुनिसंघ के प्रवचन 8:15 बजे से हो रहे हैं मुनि श्री ने कहा कि प्रतिदिन कम से कम 15 मिनट योग एवं प्राणायाम के लिए अवश्य निकालना चाहिए! अनुलोम-विलोम का नियमित अभ्यास शरीर को पर्याप्त शुद्ध ऑक्सीजन प्रदान करता है, जिससे मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है।Advertisement for Sudha Amrit mustard oil showing metal tin and assorted bottles (5 L, 2 L, 1 L, 500 ml, 200 ml) with 100% pure claim and contact number 9602091568.

 

उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी मोबाइल के अत्यधिक उपयोग के कारण देर रात तक जागती है और सुबह देर से उठती है, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है।इससे मानसिक संतुलन प्रभावित होता है तथा दिन भर की दिनचर्या अव्यवस्थित हो जाती है।
उन्होंने कहा कि जैनाचार्यों ने जिनवाणी के माध्यम से जीवनोपयोगी सभी महत्वपूर्ण सिद्धांतों का वर्णन किया है। यदि हम नियमित रूप से जिनवाणी का अध्ययन करें तो हित-अहित का ज्ञान सहज रूप से प्राप्त होता है। साथ ही जैन दर्शन के मूल आधार सात तत्वों का यथार्थ स्वरूप भी समझ में आता है, जो आत्मकल्याण एवं मोक्षमार्ग की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है।

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मुनि श्री ने सभी श्रद्धालुओं से स्वास्थ्य, संयम, स्वाध्याय और आध्यात्मिक चिंतन को जीवन का अभिन्न अंग बनाने का आह्वान किया, जिससे जीवन में सुख, शांति और आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त हो सके।धर्मसभा में नरकगति के विषय में विवेचन करते हुए मुनि श्री ने कहा कि नरक में रहने वाले जीव अत्यंत भयंकर कष्ट भोगते हैं।वहाँ की पीड़ा इतनी तीव्र होती है कि जीव एक क्षण भी चैन नहीं पाता, फिर भी वह आत्महत्या नहीं कर सकता, क्योंकि नरक की आयु पूर्ण होने से पहले मृत्यु संभव नहीं होती। शरीर के टुकड़े-टुकड़े हो जाने पर भी कर्मों के प्रभाव से वह पुनः पूर्ववत हो जाता है और अपनी निर्धारित आयु तक दुःख भोगता रहता है।उन्होंने कहा कि ऐसी विकट परिस्थितियों में जब जीव असहनीय दुःखों का अनुभव करता है, तब उसे पूर्व जन्मों में सुनी हुई जिनवाणी, धर्मोपदेश और संतों के वचनों का स्मरण होने लगता है।उसे यह बोध होता है कि वर्तमान दुःख उसके अपने ही पापकर्मों का फल है। परिणामस्वरूप उसके भीतर गहरा पश्चाताप जागृत होता है और जिनधर्म के प्रति अटूट श्रद्धा उत्पन्न होने लगती है।Hindi advertisement poster with bold red headline and black subheading about a snack, set against a warm orange sunrise background with silhouettes of people walking; inset image shows bowls of assorted fried snacks in trays at the bottom right.

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मुनि श्री ने कहा कि अनेक जीव संसार में जिनवाणी सुनकर भी उसके महत्त्व को नहीं समझते, किंतु नरक की वेदनाएँ उन्हें अपनी भूल का एहसास करा देती हैं। जिनवाणी का संस्कार कभी व्यर्थ नहीं जाता। यही कारण है कि घोर दुःखों के मध्य भी जीव में सम्यग्दर्शन का उदय हो सकता है, जो भविष्य में मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होने का कारण बनता है।जिनवाणी की महिमा का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि इतिहास में अनेक बार धर्मग्रंथों को नष्ट करने और जिनवाणी की अवहेलना करने के प्रयास हुए, फिर भी उसका प्रकाश कभी समाप्त नहीं हुआ।

 

 

जिनवाणी जीवों को अज्ञान, पाप और दुःख के अंधकार से निकालकर आत्मकल्याण का मार्ग दिखाती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को श्रद्धा, विनय और एकाग्रता के साथ जिनवाणी का श्रवण एवं अध्ययन करना चाहिए, क्योंकि उसके संस्कार कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी जीव का कल्याण करने में समर्थ होते हैं।
(अविनाश जैन ‘विद्यावाणी) से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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