सच तो यह है कि गुना में केवल इंदौर नहीं आया था, श्रद्धा आई थी। श्रीश जैन ललितपुर की कलम से
गुना
वास्तव में रविवार का वातावरण देखकर बरबस उन दिनों की स्मृति ताजा हो गई जब आचार्य गुरुश्रेष्ठ के चातुर्मास से पूर्व नगरों की धड़कनें तेज हो जाया करती थीं, जब श्रद्धा सड़कों पर उतर आती थी और जब किसी संत को आमंत्रित करने के लिए समाज अपनी पूरी शक्ति, पूरी भावनाएं और पूरा समर्पण अर्पित कर देता था। रविवार को गुना में कुछ वैसा ही नहीं, बल्कि उससे भी अधिक भावपूर्ण दृश्य दिखाई दिया।
समूचा इंदौर मानो एक परिवार बनकर उपस्थित था। एक बैनर, एक भावना, एक लक्ष्य और एक ही पुकार—”गुरुवर, इंदौर पधारिए।” युवा शक्ति का उत्साह देखते ही बनता था। उनके चेहरों पर चमक थी, आंखों में स्वप्न थे और हृदय में अपने आराध्य के प्रति अगाध श्रद्धा थी। ऐसा लग रहा था मानो इंदौर का प्रत्येक श्रद्धालु अपने भीतर एक चातुर्मास लिए बैठा हो और वह उसे साकार होते देखना चाहता हो।
और यह सब किसी साधारण संत के लिए नहीं था।यह उस महापुरुष के लिए था जिन्होंने अपने तप की अग्नि से हजारों जीवनों को प्रकाशित किया है। यह उस युगपुरुष के लिए था जिनकी वाणी में शास्त्र का गंभीर चिंतन है, जिनके व्यक्तित्व में सिंह जैसी निर्भीकता है, जिनकी साधना में हिमालय जैसी ऊंचाई है और जिनके हृदय में गंगा जैसी निर्मल करुणा प्रवाहित होती है।

जगत पूज्य मुनि पुंगव सुधासागर जी महाराज केवल एक संत नहीं, वे एक चलती-फिरती प्रेरणा हैं।
वे जहां जाते हैं वहां केवल धर्मसभा नहीं होती, वहां चेतना जागती है।
वे केवल प्रवचन नहीं देते, वे आत्मा को झकझोर देते हैं।
वे केवल मार्ग नहीं बताते, वे स्वयं मार्ग बन जाते हैं।

रविवार को उनके समक्ष खड़े हजारों श्रद्धालुओं की आंखों में जो भाव था, वह किसी आयोजन की सफलता का परिणाम नहीं था। वह उन वर्षों की साधना का प्रतिफल था जो मुनिश्री ने समाज को जागृत करने में लगा दिए। उनके प्रति लोगों का आकर्षण व्यक्ति के प्रति नहीं, व्यक्तित्व के प्रति है; शरीर के प्रति नहीं, साधना के प्रति है।

जयघोष जब उठते थे तो ऐसा लगता था मानो गुना का आकाश भी “जय हो” कह रहा हो। भक्ति नृत्य हो रहे थे, श्रद्धा उमड़ रही थी, भावनाएं छलक रही थीं। और सबसे अद्भुत बात यह थी कि लोग केवल दर्शन नहीं कर रहे थे, वे अपने भीतर एक आध्यात्मिक उत्सव का अनुभव कर रहे थे।
मंच से युवाओं के संकल्प सुनकर स्पष्ट महसूस हुआ कि इंदौर केवल चातुर्मास मांग नहीं रहा, वह उसे अपने जीवन का गौरव बनाना चाहता है। उनके शब्दों में विनम्रता भी थी और विश्वास भी। समर्पण भी था और संकल्प भी।

श्रीश जैन ललितपुर बताते हैं कि मेरी दीदी और जीजाजी भी महालक्ष्मी नगर से अपने साथियों के साथ पहुंचे थे। लौटते समय उनके चेहरे पर जो संतोष था, वह किसी साधारण यात्रा का नहीं था। वे बार-बार एक ही बात कह रहे थे—”इस बार वातावरण कुछ अलग है, इस बार विश्वास कुछ अधिक मजबूत है।”
सच तो यह है कि गुना में केवल इंदौर नहीं आया था, श्रद्धा आई थी। आज केवल आमंत्रण नहीं दिया गया था, आज हृदय बिछाए गए थे। आज केवल चातुर्मास की चर्चा नहीं हुई थी, आज गुरु भक्ति का ऐसा अध्याय लिखा गया जिसे सुनकर आने वाली पीढ़ियां भी गर्व करेंगी।
और जब जगत पूज्य जैसे तपोनिधि, त्यागमूर्ति, धर्मध्वज वाहक और युग प्रेरक संत के चरणों में समाज इस प्रकार उमड़ पड़े, तो मन सहज ही कह उठता है—
“यह भीड़ नहीं है, यह विश्वास है।
यह आयोजन नहीं है, यह अनुराग है।
यह आग्रह नहीं है, यह आत्मसमर्पण है।
और यह संत सामान्य नहीं, वह विभूति हैं जिनके चरणों में युग अपना मस्तक झुकाता है।”
वाह गुरुवर…!
आपकी साधना बोलती नहीं, दिखाई देती है।
आपका प्रभाव बताया नहीं जाता, महसूस किया जाता है।
और आपकी लोकप्रियता प्रचार से नहीं, श्रद्धा से निर्मित हुई है।
॥जय गुरुवर॥॥
श्रीश ललितपुर आलेख संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
