*पावागढ़ में कर्म सिद्धांत, आत्मज्ञान और मोक्ष मार्ग का प्रेरक संदेश- आचार्य श्री सुनील सागर जी*
पावागढ़ (गुजरात),3 जून 2026।
सिद्धक्षेत्र पावागढ़ की पावन भूमि पर एक भव्य आध्यात्मिक प्रवचन सभा का आयोजन हुआ, जहाँ आचार्य श्री सुनील सागरजी ने कर्म सिद्धांत, आत्म-परिणमन और मोक्ष मार्ग पर गहन और प्रेरणादायक संदेश दिया।
प्रवचन में बताया गया कि जीव अपने मन, वचन और काया के भावों से स्वयं ही कर्मों का निर्माण करता है। बाहरी कोई दफ्तर, चित्रगुप्त या किसी प्रकार का “रिकॉर्ड सिस्टम” नहीं, बल्कि आत्मा के ही भाव कर्म को आकर्षित करते हैं। जैन दर्शन के अनुसार यह एक पूर्णतः वैज्ञानिक और वास्तविक प्रक्रिया है, जहाँ जीव का राग-द्वेष और कषाय ही कर्म बंध का कारण बनते हैं।

आचार्य श्री ने समझाया कि जैसे कैमरा अपने सामने आने वाले दृश्य को सूक्ष्म रूप में रिकॉर्ड कर लेता है और जैसे वर्षा के बाद पृथ्वी से अंकुर फूट पड़ते हैं, वैसे ही जीव के भावों के अनुसार सूक्ष्म कर्म-पुद्गल आत्मा से जुड़कर आठ प्रकार के कर्मों—ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अंतराय—रूप में फल देने लगते हैं।

प्रवचन में यह भी कहा गया कि संसार में दुख, अशांति और भटकाव का मूल कारण आसक्ति, मोह और कषाय हैं। इनसे मुक्ति का मार्ग केवल संवर और निर्जरा है—अर्थात् अशुभ भावों का निरोध और कर्मों का क्षय। जब जीव अपने स्वभाव में स्थित होकर आत्मा की ओर उन्मुख होता है, तभी मोक्ष मार्ग प्रशस्त होता है।

आचार्य श्री ने सामाजिक संदेश देते हुए कहा कि जैसे पशु समूह में रहने पर सुरक्षित रहते हैं, वैसे ही मनुष्य भी धर्म, गुरु और संघ के सान्निध्य में सुरक्षित रहता है। अकेलापन, अहंकार और धर्म से दूरी जीव को कषाय रूपी “कुत्तों” की तरह घेर लेते हैं और पतन की ओर ले जाते हैं, जबकि गुरुओं का सान्निध्य आत्मा को संरक्षण देता है।
सभा में यह भी बताया गया कि इस कलियुग जैसे दुषमकाल में भी सच्चे साधु-संतों और तीर्थक्षेत्रों का सान्निध्य जीव के लिए मोक्ष मार्ग को सरल बनाता है। अंत में सभी श्रद्धालुओं ने 24 तीर्थंकरों की जयघोष के साथ वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया और यह संदेश दिया गया कि—सही भाव, सही ज्ञान और सही आचरण ही कर्म बंध से मुक्ति और मोक्ष का एकमात्र मार्ग है।”
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
