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कषायों को मंद करने का अचूक उपाय है जागरूकता और भावनायोग : मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज

धर्म

कषायों को मंद करने का अचूक उपाय है जागरूकता और भावनायोग : मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज

 गिरीडीहः

गुणायतन में विराजमान मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने सांयकालीन शंकासमाधान में शंकाओं का निवारण करते हुये कहा कि “कषाय हमारी सबसे बड़ी दुर्बलताओं में से एक है। यह हमारी चेतना को ढक देती है तथा आत्मिक शक्तियों को कुंठित करती है, जीवन की शांति को भंग कर संबंधों की मधुरता को नष्ट कर देती है।” उन्होंने कषायों पर नियंत्रण का अचूक उपाय बताते हुए कहा कि कषायों को पूर्णतः जीत लेना हर किसी के बस की बात नहीं है। जैन दर्शन में क्रोध, मान, माया और लोभ इस प्रकार से चार कषाय बताई गई है,इन कषायों पर पूर्ण विजय बड़े-बड़े योगी ही प्राप्त कर पाते हैं, लेकिन कषायों को मंद करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए संभव है, यदि वह उन्हें नियंत्रित करने की सही दृष्टि विकसित कर ले तो कषायों को मंद किया जा सकता है।

 

 

 

मुनि श्री ने कहा कि घर, परिवार या समाज में यदि कोई व्यक्ती कषाय कर रहा है, तो सबसे पहले उसे नज़रअंदाज़ करने की कला आना चाहिये नजर अंदाज के बाद भी वह नहीं माने तोउसे सहन करने की क्षमता विकसित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कई बार छोटी-छोटी बातों पर बखेड़ा खड़ा हो जाता है, जिनका न हाथ होता है,न पैर घटना कुछ होती है, लेकिन लोग उसे बढ़ा-चढ़ाकर ऐसा प्रस्तुत करते हैं, जिससे समाज में तनाव उत्पन्न होता है। यदि ऐसी बातों को अनदेखा किया जाए, तो वे हम पर हावी नहीं होंगी। उन्होंने कहा कि घर-परिवार में यदि किसी ने कुछ कटु बाक्य कह दिया,तो उन बातों को पचा लेने का अभ्यास होंना चाहिए। इससे परिस्थितियाँ हमें विचलित नहीं कर पाएंगी,तथा कषायें मंद रहेंगी और मन शांत बना रहेगा।

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मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि कषायों को कम करने का दूसरा महत्वपूर्ण उपाय अपनी आसक्ति को घटाना है। जितनी अधिक आसक्ति होती है, उतनी ही कषाय प्रबल होती है। जो व्यक्ति मध्यम मार्ग अपनाकर जीवन जीता है, उसकी कषायें अपेक्षाकृत मंद रहती हैं।उन्होंने कहा कि जीवन में ऐसे संस्कार और अभ्यास विकसित करने चाहिए, जो कषायों को शांत करें। इसमें “भावनायोग” अत्यंत प्रभावी साधन है। जो व्यक्ति नियमित भावनायोग करता है, उसके जीवन में सहजता, सरलता, संयम और सकारात्मकता स्वतः आने लगती है।मुनि श्री ने प्रेरणा देते हुए कहा कि हमें अपने भीतर बार-बार यह भावना जागृत करनी चाहिए—

“मुझे सहज रहना है”

“मुझे शांत रहना है”

“मुझे संयम रखना है”

“मुझे सकारात्मक रहना है”

 

उन्होंने कहा कि ये चार सूत्र पूरे जीवन को बदलने की क्षमता रखते हैं। यदि हम ऐसी दृष्टि और सोच विकसित करें, तो जीवन में बड़ा परिवर्तन आ सकता है। लेकिन यह तभी संभव होगा, जब भीतर से यह जागरूकता उत्पन्न हो कि “मुझे अपनी कषायों को कम करना है।” जब तक व्यक्ति कषायों के प्रति सजग नहीं होगा, तब तक उन पर नियंत्रण संभव नहीं हो सकता।

 

 

उपरोक्त जानकारी गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ने देते हुये बताया प्रतिदिन संध्याकाल में 6:20 से 7:20 तक गुणायतन श्री सम्मेदशिखर जी तीर्थराज पर लाईव होता है जिसे भारत ही नहीं अपितु विदेशों में भी करोड़ों मुनिभक्त श्रद्धालु सुनते है तथा अपनी सामाजिक/ व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान पाते है।                         

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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