भारत में “त्याग” को पूजा जाता है जो अपने धर्म के प्रति अडिग रहते है उनको सदेव सम्मान मिलता है” मुनि श्री प्रमाण सागर

धर्म

“भारत में “त्याग” को पूजा जाता है जो अपने धर्म के प्रति अडिग रहते है उनको सदेव सम्मान मिलता है” मुनि श्री प्रमाण सागर

 भोपाल

-शंकासमाधान एवं भावनायोग प्रणेता मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ससंघ शायपुरा में विराजमान है।उपरोक्त जानकारी देते हुये प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया मुनि श्री का आज सोमवार का मौन रहा उन्होंने विगत सांयकाल प्राईड सभाग्रह में आयोजित शंकासमाधान में प्रशासनिक अधिकारियों तथा प्रशासनिक सेवा में आये युवाओं के द्वारा अपनी शंकाओं को रखा जिसे मुनि श्री ने सरल तरीके से उन शंकाओं का समाधान किया।।

 

 

तीन युवा जो कि अभी अभी प्रशासनिक सेवा में आए है उनका समिति ने सम्मान किया उन्होंने प्रश्न किया कि “हम अपने धर्म और कर्तव्य” का पालन कैसै करें?  उत्तर देते हुये मुनि श्री ने कहा कि प्रशासनिक दायित्व का पालन ही हमारा धर्म है, उसे धर्म मानकर ही पूरा करना चाहिये जहा तक धार्मिक मूल्यों की बात है,तो कोई भी धार्मिक मूल्य हमारी किसी भी प्रशासनिक कार्य की पूर्ति में बाधा नहीं बनते बल्कि हमारा धर्म तो कर्तव्य की पूर्ती में सहायक और साधक बनता है, आपके मन में जो प्रश्न है कि प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच अपने धर्म को कैसे निभायें तो “अधर्म न करना ही मेरा सबसे पहला धर्म है”

आप लोग धर्म की क्रिया भले न कर पाओ लेकिन पद पर रहते हुये धर्म की प्रभावना और धर्म के संरक्षण में अपना योगदान तो दे सकते हो,

 

 

 

एक अधिकारी अपने अधिकारों के दायरे में रहते हुये भी वह काम कर सकता है,जो एक सामान्य व्यक्ति नहीं कर सकता जहा भी रहो अपने जैन मूल्यों की छाप छोड़ो इस बात को सदैव ध्यान में रखो कि”भारत में “त्याग” को पूजा जाता है, इसलिये अपने धर्म के प्रति सदैव अडिग रहो जो अपने दायित्वों के साथ अपने मूल्यों की रक्षा करने में तत्पर रहता है, उनको सदेव सम्मान मिलता है” उन्होंने कहा कि यहा पर जो पूर्व आइ.ए.एस अधिकारी है और प्रशासनिक सेवाओं में उच्च पदों पर रहकर के अपने धार्मिक संस्कारों के प्रति सदैव अडिग रहे,और वह सम्मान के पात्र बने उन पूर्व के उच्च अधिकारियों से आपको परामर्श लेना चाहिये जिससे आप पद पर रहकर भी धर्म की प्रभावना कर सकें।

 

 

एक और प्रश्नःभगवान के निर्वाण महोत्सव पर श्रद्धा और भक्ती के फल स्वरूप लाड़ू ही क्यों चढ़ाया जाता है? का उत्तर देते हुये मुनि श्री ने कहा कि भगवान महावीर का निर्वाण महोत्सव हम सभी के लिये एक बड़ा उत्सव है, मिठाइयों में सर्वश्रेष्ठ मिठाई मोदक यानि लडडू है,कोई खुशी का अवसर आता है तो आप लोग भी कहते हो कि “लडडू बांटो” और यह भारतीयों की प्रिय मिठाई (मोदक) है,तो भगवान के चरणों में अपनी प्रिय वस्तु के चढ़ाने का भाव रखा है इसलिये भगवान के निर्वाण कल्याणक पर लाडू चढ़ाने की परंपरा है।

(अविनाश जैन विद्यावाणी) से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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