सफलताओं के सौ बाप होते हैं..असफलता तो अनाथ होती है..! अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज
परतापुर बांसवाड़ा राजस्थान
अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय पियूष सागरजी महाराज ससंघ परतापुर बांसवाड़ा राजस्थान में विराजमान हैं उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि संसार में कोई भी कार्य कठिन नहीं है, हम ही आलसी और मन के गुलाम हो गए हैं। राग और विराग, संसार और संन्यास, निवृत्ति और प्रवृत्ति — मानव जीवन और मन की यही विशेषताएँ हैं। कुछ चीजें हमें अपनी ओर आकर्षित करती हैं और कुछ से हम दूरी बनाए रखते हैं।
मनुष्य के मन की तर्कशक्ति बड़ी प्रबल होती है। वह असत्य के पक्ष में भी जोरदार दलीलें दे सकता है, परन्तु जीवनभर एक सत्य पर स्थिर नहीं रह पाता, क्योंकि परिवर्तन मनुष्य का स्वभाव और नियति दोनों है। उसकी यह प्रवृत्ति उसके पौरुष को अभिव्यक्त तो करती है, लेकिन इसे हम पुरुषार्थ नहीं कह सकते।




रागी मन संसार के सृजन में दौड़ेगा और वैरागी मन निवृत्ति की ओर अग्रसर होगा। यह दुनिया निवृत्ति की ओर नहीं, बल्कि प्रवृत्ति की ओर संकेत करती है। रागयुक्त मन कुछ और पाने की चाह में पूरा जीवन लगा देता है, फिर भी तृप्त नहीं हो पाता।
सन्यास का मार्ग इच्छाओं को दहन करने का मार्ग है। जब तक वैरागी या सन्यासी अपनी इच्छाओं को होली की अग्नि में समर्पित नहीं करता, तब तक उसका सन्यास मार्ग भी फलित नहीं होता। क्योंकि इच्छा ही हमारी सबसे बड़ी वासना है…!!!
नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
