A monk sits on a carved wooden seat at a temple altar while a large group of men and women stand and pray nearby with folded hands and offerings on the floor.

किशनगढ़ भक्तों ने आकर वर्ष 2026 के वर्षायोग हेतु श्रीफल भेंट कर निवेदन किया णमोकार मंत्र की महिमा बहुत है मिथ्यात्व और लोभ पतन की ओर ले जाते हैं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

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किशनगढ़ भक्तों ने आकर वर्ष 2026 के वर्षायोग हेतु श्रीफल भेंट कर निवेदन किया णमोकार मंत्र की महिमा बहुत है मिथ्यात्व और लोभ पतन की ओर ले जाते हैं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

धामनोद*// दीपक प्रधान की रिपोर्ट

किशनगढ़ मार्बल नगरी ,समाधिस्थ मुनिश्री समता सागर जी, श्री निस्पृह सागर ,श्री भविक सागर जी आर्यिका श्री निर्मुक्त मति सहित अनेक साधुओं की जन्म और कर्मभूमि भामाशाहों दानवीरों की नगरी है। किशनगढ़ से सैकड़ों भक्तों ने चन्द्पूरी बड़ के बालाजी जयपुर में ग्रीष्मकालीन वाचना हेतु विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी को संयमी जीवन का 58 वा वर्षायोग करने हेतु निवेदन किया। इसके पूर्व चित्र अनावरण दीप प्रवज्जलन, आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट करने का सौभाग्य किशनगढ़ के भक्तों को प्राप्त हुआ।

राजेश पंचोलिया के अनुसार इस अवसर पर आयोजित धर्म सभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उपदेश में बताया कि सीकर में दीक्षा गुरु आचार्य श्री धर्मसागर जी की तथा लुंनवा में शिक्षा गुरु आचार्य कल्प श्री श्रुत सागर जी महाराज की समाधि स्थली है हमारी ओर संघ की भावना पहले दोनों नगरों दर्शन वंदना की हैं उसके बाद चातुर्मास स्थल का निर्णय करेंगे।किशनगढ़ के भक्तों ने वर्ष 2014 में वर्षायोग के बाद 12 वर्ष का युग वनवास होने का उल्लेख किया है। किशनगढ़ समाज गुरुभक्त समाज है।प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की परंपरा में आचार्य श्री शिव सागर जी ,आचार्य श्री धर्म सागर जी सहित पूर्वाचार्य किशनगढ़ में आए हैं तथा चातुर्मास भी किया हमने भी उनके साथ वर्ष 1977 ,1987 चातुर्मास किया उसके बाद वर्ष 1998 तथा 2014 में चातुर्मास किया है। सुरेश सबलावत भागचंद चुड़ीवाल के अनुसारप्रातःकालीन सूर्योदय समय प्रवचन में णमोकार मंत्र की महिमा, मिथ्यात्व से बचने तथा सम्यकदर्शन कामहत्व ,णमोकार मंत्र का अपमान नहीं करना चाहिए बारह चक्रवर्तियों में से एक सुभौम चक्रवर्ती स्वाद के लोभ में पड़ गए। एक देव ने उन्हें आम का लालच देकर समुद्र पार ले जाने का प्रयास किया। बीच समुद्र में नाव डुबाने का प्रयत्न किया गया, लेकिन सुभौम चक्रवर्ती के मन में निरंतर णमोकार मंत्र का जाप चल रहा था, इसलिए वे सुरक्षित बच गए। जब उस देव ने णमोकार मंत्र का अपमान करते हुए उसे पानी पर लिखकर मिटवाया तो उसे भारी पाप का बंध हुआ और नरक गति प्राप्त हुई। इस प्रसंग से शिक्षा मिलती है कि मंत्र, धर्म, देव और गुरु का कभी अपमान नहीं करना चाहिए। मिथ्यात्व आत्मा का सबसे बड़ा शत्रु है। जो जीव सम्यकदर्शन प्राप्त कर लेता है, वह अधोगति से बच जाता है। देव, गुरु और सात तत्त्वों का जैसा वास्तविक स्वरूप है, वैसा ही श्रद्धान करना चाहिए।आचार्य श्री ने आगे सूत्र दिया कि णमोकार मंत्र की महिमा असीम है। ,लोभ और मिथ्यात्व जीव को पतन की ओर ले जाते हैं। सम्यकदर्शन आत्मा का महान कल्याण करता है। देव, गुरु और धर्म का सदैव आदर करना चाहिए। धर्म में सही श्रद्धा, विवेक और शुद्ध भाव आवश्यक हैं।

राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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