♦अनजाने में किसी जीव की हानि हो जाती है, तो उसे पूर्ण हिंसा का दोष नहीं माना जाता : मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज
मधुबन
मधुबन स्थित गुणायतन में विराजमान मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने सायंकालीन शंकासमाधान कार्यक्रम में हिंसा और अहिंसा के गूढ़ सिद्धांतों पर विस्तार से प्रकाश डाला। सामान्य रूप से किसी जीव की मृत्यु को हिंसा माना जाता है, लेकिन जैन दर्शन केवल बाहरी घटना को नहीं, बल्कि उसके पीछे के भाव और मनोस्थिति को भी महत्व देता है।
मुनि श्री ने बताया कि जैन शास्त्रों में हिंसा का वास्तविक कारण केवल जीव की मृत्यु नहीं, बल्कि प्रमाद, राग-द्वेष, कषाय और असावधानी से उत्पन्न भाव है। यदि कोई व्यक्ति करुणा, सावधानी और यत्नपूर्वक कार्य करता है और अनजाने में किसी जीव की हानि हो जाती है, तो उसे पूर्ण हिंसा का दोष नहीं माना जाता। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि डाकू जानबूझकर हत्या करता है, इसलिए वह पूर्ण अपराधी होता है। वहीं ड्राइवर से यदि लापरवाही में दुर्घटना हो जाए तो उसे दोष लगता है, लेकिन यदि पूरी सावधानी बरती गई हो तो वह दोषी नहीं माना जाता। 


डॉक्टर रोगी को बचाने के उद्देश्य से उपचार करता है, बावजूद यदि रोगी की मृत्यु हो जाए, तो उसे हत्यारा नहीं कहा जाता, क्योंकि उसका भाव बचाने का होता है, मारने का नहीं। उन्होंने बताया कि जैन धर्म में यत्नाचार पर विशेष बल दिया गया है, जिसमें प्रत्येक कार्य चलना, बोलना, खाना और व्यवहार करना-पूर्ण सावधानी और संवेदनशीलता के साथ किया जाना चाहिए।



भगवान महावीर ने अहिंसा को दो स्तरों में समझाया है मुनियों के लिए महाव्रत और गृहस्थों के लिए अणुव्रत। परिस्थिति में हिंसा या प्रतिकार नहीं करते, जबकि गृहस्थ जीवन में सीमित और नियंत्रित जीवन अपनाना होता है।
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
