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मधुबन में सांयकालीन शंकासमाधान सभा, : मुनि प्रमाण सागर ने अहिंसा, संयम और शुद्ध आहार की महत्ता बताई, कहा-आचरण से ही पहचान बनती है, कुलाचार का पालन जरूरी

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मधुबन में सांयकालीन शंकासमाधान सभा, : मुनि प्रमाण सागर ने अहिंसा, संयम और शुद्ध आहार की महत्ता बताई, कहा-आचरण से ही पहचान बनती है, कुलाचार का पालन जरूरी
मधुबन
मधुबन में सांयकालीन शंकासमाधान सभा में मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि जिस प्रकार भूमि की उर्वरता का पता उसमें उगने वाली फसल से चलता है, उसी प्रकार मनुष्य की पहचान उसके आचरण से होती है। केवल नाम के आगे किसी विशेष समाज या धर्म का उल्लेख कर लेना पर्याप्त नहीं है, असली पहचान व्यक्ति के व्यवहार और चारित्र से बनती है।

 

 

उन्होंने कहा कि जैन नाम लिख – लेने से कोई व्यक्ति जैन नहीं बन जाता, बल्कि उसके आचरण में जैनत्व की झलक होनी चाहिए। व्यक्ति के संस्कार और व्यवहार ही उसके कुल और परिवार की असली पहचान बताते हैं। इसलिए हर व्यक्ति को अपने आचरण को शुद्ध और मर्यादित रखना चाहिए।

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मुनि श्री ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि अपनी परंपराओं और पहचान को कभी नहीं खोना चाहिए। जिस परिवार और वंश में अहिंसा, संयम और शुद्ध आहार की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही हो, वही उसका कुलाचार कहलाता है। उन्होंने कहा कि भोजन की शुद्धता और व्यवहार की शुद्धता कुलाचार का महत्वपूर्ण आधार है। जिस घर में कुलाचार का पालन होता है, वहां दुराचार पनप नहीं सकता। उन्होंने कहा कि जैन समाज का यह सौभाग्य है कि उसकी परंपराओं में अहिंसा गहराई से जुड़ी हुई है। इसलिए सभी को खान-पान और व्यवहार में हिंसा से बचना चाहिए तथा अपने पूर्वजों की श्रेष्ठ परंपराओं का पालन करना चाहिए।

मुनि श्री ने चिंता जताते हुए कहा कि आज के समय में आधुनिकता के नाम पर लोग अपनी परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं। युवाओं में “सब चलता है” जैसी सोच बढ़ रही है, जो समाज और स्वयं उनके भविष्य के लिए नुकसानदायक है। इसलिए आवश्यक है कि लोग अपने कुलाचार का पालन करें और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करें। सभा में उन्होंने गुरु की महिमा का भी वर्णन किया। उन्होंने कहा कि गुरु मोक्षमार्ग और आत्ममार्ग पर स्वयं चलकर दूसरों को भी उसी दिशा में चलना सिखाते हैं। शास्त्र पढ़ लेना अलग बात है, लेकिन उसे जीवन में उतारने का मार्गदर्शन गुरु ही देते हैं। गुरु केवल उपदेश नहीं देते, बल्कि स्वयं जीकर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने कहा कि जैसे संगीत की पुस्तक पढ़कर राग को समझा नहीं जा सकता, लेकिन उस्ताद को गाते सुनकर विश्वास होता है, उसी प्रकार गुरु जीवन को साधने की प्रेरणा देते हैं।

 

 

जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए, वही सच्चा गुरु है। गुरु व्यक्ति को बांधता नहीं, बल्कि उसे स्वतंत्र रूप से चलना सिखाता है और आत्मनिर्भर बनाता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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