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सन्तान न होना एक दुःख है,सन्तान होकर सफल न होना उससे बड़ा दुःख है.. अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज 

धर्म

सन्तान न होना एक दुःख है,सन्तान होकर सफल न होना उससे बड़ा दुःख है.. अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज 

 

 परतापुर बांसवाड़ा राजस्थान

 

अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि और सन्तान का सफल होकर बदल जाना,जीवन का सबसे बड़ा दुःख है..! इसलिए जिन्हें सन्तान सुख प्राप्त है, वे भाग्यशाली हैं और जिन्हें सन्तान से सुख प्राप्त है, वे सौभाग्यशाली हैं। अच्छी सन्तान माता-पिता की सेवा में सदैव तत्पर रहती है और योग्य, सुसंस्कारी सन्तान माता-पिता, देव, गुरु, धर्म और देश की सेवा के लिए सदैव आतुर रहती है।

 

 

 

तत्पर और आतुर होने में जमीन-आसमान का अन्तर है। तत्पर का अर्थ है — जो कर्तव्यबोध से सेवा करे, वह तत्पर है। और जो उत्सुकता, समर्पण एवं भाव-विभोर होकर सेवा-भक्ति के लिए बेचैन रहे, वह आतुर है।

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माता-पिता की सेवा में तत्पर होना कर्तव्य है, और देव, गुरु, धर्म और देश की सेवा-भक्ति के लिए उतावलापन होना, परिणाम प्राप्त करने की भावना रखना — यही आतुरता है। जैसे निमन्त्रण और आमन्त्रण दोनों शब्द देखने में समान प्रतीत होते हैं, किन्तु दोनों में बहुत अन्तर है। आमन्त्रण का अर्थ है — इच्छा हो तो आइए, नहीं तो कोई बात नहीं। जबकि निमन्त्रण का अर्थ है — चाहे कितनी भी व्यस्तता हो, आपको अवश्य आना है। आमन्त्रण में फाॅरमल्टी (औपचारिकता) होती है, और निमन्त्रण में रियल्टी (आत्मीयता एवं वास्तविकता) होती है…!!!                

 

 नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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