आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज की चित्तौड़गढ़ आगमन पर मुनिश्री अरहसागर महाराज ने की चरण वंदना जीवन में सुख शान्ति की बड़ी ही जरूरत है आर्जव सागर महाराज
चित्तौड़गढ़
13 वर्षों के बाद आचार्य श्री 108 आर्जव सागर महाराज का नगर में मंगल प्रवेश हुआ जिसको लेकर नगर में भव्य उत्साह का वातावरण था नगर के प्रमुख मार्गो से होते हुए भव्य जुलूस निकाला गया जगह जगह गुरुदेव का मंगल पद प्रक्षालन कर मंगल आरती की गई।
जैसे ही शास्त्री नगर में मंगल प्रवेश किया तो विनय सम्पन्नता का एक अनुपम उदाहरण देखने को मिला पूर्व में नगर में विराजमान परम पूज्य मुनि श्री 108 अरहसागर महाराज ने परम पूज्य आचार्य गुरुदेव 108 आर्जव सागर महाराज की चरण वंदना की उन्हें नमोस्तु किया उनके चरणों का पद प्रक्षालन किया उनकी परिक्रमा की यह दृश्य सभी को भाव विभोर कर गया।

इन मांगलिक पलों में आचार्य श्री 108 आर्जवसागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन के दौरान धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में सुख शांति की बड़ी ही जरूरत है।प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक क्षण ही इसकी खोज करते रहते हैं।



भैया सच्चा सुख तो अपनी आत्मा में ही है।आत्मा को प्राप्त करने के लिए हमें कर्म रूपी बीज को जलाना पड़ेगा ;जिससे संसार का अंत होगा। और हम अपनी आत्मा को प्राप्त कर परमात्मा बन पाएंगे। मोक्ष प्राप्त कर पाएंगे।
धर्मप्रेमी बंधुओ! आप सभी पूर्ण रूप से सभी प्रकार की चिंताओं को दूर करने के लिए प्रभु के चरणों में आते हैं ;जहां पर आप सभी के लिए पूर्ण शांति -सुख का अनुभव होता है।
जीवन में आध्यात्मिक शांति -सुख का अन्य कोई दूसरा साधन नहीं है, मात्र मंदिर जी ही एक ऐसा साधन है; जिसमें प्रभु दर्शन से सच्ची शांति और सच्चा सुख प्राप्त होता है।
आचार्य श्री ने कहा कि दुख तीन तरह के होते हैं तन का दुख, मन का दुख, और धन का दुख।
धन तो जीवन में बहुत मिलता है। जैसे राजकुल में जन्म लेने वाले तीर्थंकरों को भी धन की कोई कमी नहीं थी। उनके काल में तो भूमि पर कोई भी जीव दीन -दरिद्र नहीं रहता था। हमेशा रत्नो की वर्षा होती रहती थी। सभी जीव खुशहाल पूर्वक अपना जीवन यापन करते थे। और सभी जीव राग द्वेष से दूर होकर सदैव संतुष्ट भी रहते थे।
फिर भी वह तीर्थंकर इस संसार की असारता को समझ कर अपनी आत्मा और शरीर के भेद विज्ञान को जानकर ऐसे अपार वैभव को छोड़कर… जिन दीक्षा (मुनिपद ) धारण कर लेते हैं।सभी तीर्थंकर जन्म से ही अनंत बल के धारी होते हैं। उनसे बलशाली अन्य दूसरा व्यक्ति नहीं होता है एवं उन्हें कोई हरा भी नहीं सकता। ऐसे जैन धर्म में 24 तीर्थंकर कह गए हैं जिनमें सभी में समान बल और समान शक्ति होती है।
बंधुओ!आपके पास तो इतना उन तीर्थँकर के समान अपार धन वैभव भी नहीं है कि जिसे छोड़ने में आपको दुख हो।….फिर भी आपसे छोड़ नहीं जाता। आप सभी इस धन के पीछे दिन-रात क्या पूरा जीवन ही बिता देते हैं।और धर्म ध्यान को भूल जाते हैं। बंधुओ!धर्म को नहीं भुलाओ….उसे ध्यान में रखो। प्रतिदिन जिनेंद्र प्रभु वीतराग प्रभु की वाणी को गुरुओ के माध्यम सुनो और अमल में लाओ, जीवन को महान बनाओ।
आचार्य श्री जी ने संसार और मोक्ष की पहचान कराते हुए और भी बताया कि संसार क्या है?संसरितीति संसार : अर्थात चारों गतियों (मनुष्य गति, तिर्यंच गति,देव गति और नरक गति )में भ्रमण का नाम ही संसार है।और मोक्ष क्या है? तो जहां संपूर्ण कर्मों का क्षय होता है, वहां मोक्ष होता है अर्थात् संपूर्ण कर्मों के क्षय का नाम ही मोक्ष है।जिसे प्राप्त करने हमें पुरुषार्थ करना है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
