सच्ची श्रद्धा वही है जो व्यक्ति को अकेले में भी गलत कार्य करने से रोके — मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज
साड़म
साड़म में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री 108 प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि मनुष्य जीवन में अनेक आदर्शों को सामने रखता है, किंतु वास्तविक परिवर्तन तभी आता है जब उन आदर्शों को व्यवहार में उतारा जाए। केवल शब्दों में श्रद्धा व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है, जब तक जीवन-रवैये में बदलाव नहीं आता, तब तक धर्म का वास्तविक स्वरूप प्राप्त नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि यदि किसी के हृदय में सच्ची श्रद्धा जाग जाए और वह अपने जीवन की सभी परिस्थितियों को उसी अनुरूप ढालने लगे, तो उसका जीवन निश्चित रूप से सफल हो सकता है।मुनि श्री ने कहा कि अक्सर देखा जाता है कि धार्मिक अवसरों पर लोग उत्साहपूर्वक पूजा-पाठ, भक्ति और धार्मिक क्रियाओं में भाग लेते हैं, परंतु कुछ समय बाद उनका व्यवहार पूर्ववत हो जाता है। इसलिए आवश्यक है कि व्यक्ति पहले स्वयं को बदलने का संकल्प ले और श्रद्धा को बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि अंतर्मन की स्थायी भावना बनाए। उन्होंने कहा कि बाहरी श्रद्धा दिखाना आसान है, लेकिन अंतरंग श्रद्धा को बनाए रखना कठिन है। सच्ची श्रद्धा वही है जो व्यक्ति के हर कर्म में जागरूकता लाए और उसे गलत कार्य करने से रोके।
इस संदर्भ में मुनि श्री ने एक प्रेरक प्रसंग सुनाया। एक गुरु अपनी पुत्री के विवाह को लेकर चिंतित थे। शिष्यों ने सहायता की इच्छा जताई तो गुरु ने कहा कि जो भी सहायता करना चाहता है, वह धन लेकर आए, लेकिन शर्त यह है कि कोई उसे देख न पाए। अगले दिन लगभग सभी शिष्य धन लेकर आ गए, परंतु एक शिष्य खाली हाथ खड़ा रहा। गुरु ने पूछा तो उसने विनम्रता से उत्तर दिया कि जब भी वह धन लेने गया, उसे लगा कि वह स्वयं देख रहा है और भगवान भी देख रहे हैं, इसलिए वह शर्त पूरी नहीं कर सका। यह सुनकर गुरु ने उसे हृदय से लगा लिया और कहा कि उसकी शिक्षा पूर्ण हुई, बाकी सबकी अधूरी रह गई।
मुनि श्री ने कहा कि यह प्रसंग बताता है कि सच्ची श्रद्धा वही है जो व्यक्ति को अकेले में भी गलत कार्य करने से रोके। जब भीतर से जागृति होती है, तभी जीवन में वास्तविक परिवर्तन आता है और वही श्रद्धा मनुष्य को सही मार्ग पर ले जाती है।

उन्होंने समर्पण के दो भावों का भी वर्णन किया। पहला, बिल्ली के बच्चे जैसा पूर्ण समर्पण—जिसमें साधक कहता है कि “आप जहाँ ले चलें, मैं वहीं चलूँगा, अब मेरा कुछ भी नहीं, सब आपका है।” दूसरा, बंदर के बच्चे जैसा प्रयासपूर्ण समर्पण—जिसमें साधक स्वयं प्रयास कर गुरु-धर्म से जुड़े रहने का संकल्प करता है और कहता है, “आप जहाँ रहेंगे, मैं आपको छोड़ूँगा नहीं।” मुनि श्री ने कहा कि इन दोनों में से कोई एक भी भाव जीवन में आ जाए, तो जीवन धन्य हो जाता है। श्रद्धा, भक्ति, सेवा और समर्पण से युक्त हृदय ही आत्मोन्नति का मार्ग खोलता है और जीवन को उर्ध्वगामी बनाता है।
मुनिसंघ के साथ चल रहे राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि प्रातःकाल साड़म में मुनि श्री की भव्य मंगल अगवानी आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज की शिष्या पूरणमति माताजी ससंघ के सानिध्य में सकल दिगंबर जैन समाज द्वारा बैंड-बाजों के साथ की गई। इस अवसर पर आर्यिका संघ ने मुनि संघ को नमोस्तु कर त्रय परिक्रमा सहित वंदना की। शोभायात्रा साड़म बाजार से होती हुई समाज के महामंत्री पंकज जैन घोंटू भैया पाटौदी निवास पहुँची, जहाँ विशाल प्रांगण में धर्मसभा संपन्न हुई। तत्पश्चात आहारचर्या संपन्न हुई तथा सांयकालीन शंका-समाधान कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसमें जिज्ञासुओं ने धार्मिक, सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन से संबंधित प्रश्न रखे और मुनि श्री ने उनका समाधान दिया। मुनिसंघ का रविवार प्रातः मंगल विहार गोमिया की ओर होगा, जहाँ प्रवचन एवं आहारचर्या संपन्न होगी। सकल दि. जैन समाज गोमिया ने सभी आस पास के धर्म श्रद्धालुओं से गोमीया पधारने का अनुरोध किया है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
