सुधासागर महाराज के ललितपुर आने की सुगबुगाहट जैसे ही वातावरण में फैली, वैसे ही शिविरार्थियों के हृदय में भी उत्साह की लहर दौड़ पड़ी। श्रीश जैन ललितपुर की कलम से
श्रावक संस्कार शिविर के जनक, जगत पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव 108 श्री सुधासागर महाराज के ललितपुर आगमन की सुगबुगाहट जैसे ही वातावरण में फैली, वैसे ही शिविरार्थियों के हृदय में भी उत्साह की लहर दौड़ पड़ी।
किसी ने स्वागत की योजना बनानी शुरू की, तो कोई अपने साथियों को संदेश देने में जुट गया—क्योंकि यह केवल आगमन नहीं, बल्कि उन उपकारों का स्मरण है जिनसे न जाने कितने जीवन दिशा पाते आए हैं।

शिविरार्थियों का मानना है कि यदि 1993 के पर्युषण पर्व में जगत पूज्य ने ललितपुर में श्रावक संस्कार शिविर की नींव न रखी होती, तो न जाने कितने लोग उस संस्कारधारा से वंचित रह जाते जिसने जीवन की दिशा ही बदल दी।

इसीलिए सभी शिविरार्थी इसे केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि गुरु उपकार का स्मरण मानते हैं और उसी कृतज्ञता की भावना से आगामी 14 मार्च की प्रातः बेला में मंगल आगवानी करने का संकल्प ले रहे हैं।

अब प्रश्न यह था कि यदि शिविरार्थी जगत पूज्य की आगवानी करें और वे सामान्य भक्तों की भीड़ में ही दिखाई दें तो शिविरार्थियों की पहचान कैसे होगी?

बस इसी विचार से अब्बू सिंघई, राजीव लकी, पवन मयंक और सुकमाल कड़नकी ने मिलकर यह निर्णय किया कि सभी शिविरार्थियों के लिए धोती-दुपट्टे की विशेष गणवेश का प्रबंध किया जाए, ताकि जहाँ भी वे खड़े हों, वहाँ से ही स्पष्ट हो जाए कि ये वही शिविरार्थी हैं जो संस्कारों की उस परंपरा के वाहक हैं।
फिर चाहे उनकी संख्या चार हजार हो या चालीस हजार, पहचान एक ही रहेगी—संस्कार और समर्पण की।
जैसे ही श्री विद्या सुधा शिविरार्थी संघ के इस संकल्प की चर्चा फैली, वैसे ही देशभर में रहने वाले शिविरार्थियों के बीच यह बात गूंजने लगी कि यदि ललितपुर में शिविरार्थी एक साथ खड़े होकर जगत पूज्य की आगवानी करेंगे, तो यह केवल स्वागत नहीं होगा, बल्कि इतिहास की एक अमिट पंक्ति बन जाएगी।
और इतिहास लिखने की परंपरा में ललितपुर सदैव अव्वल रहा है।
इसलिए मैं देशभर में निवास करने वाले सभी शिविरार्थी भाइयों से विनम्र निवेदन करना चाहता हूँ कि 14 मार्च को ललितपुर अवश्य पधारें, अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर जगत पूज्य की आगवानी करें और उनके स्नेहिल आशीर्वाद से अपने जीवन को धन्य बनाएं।क्योंकि सच ही कहा जाए तो—जगत पूज्य जैसा कोई नही
