जब तक दर्शन ज्ञान चरित्र के आगे सम्यक या समीचीन का उपयोग नहीं किया जाए तब तक इनका कोई महत्व नहीं है। निष्पक्ष सागर महाराज, निष्प्रह सागर महाराज
झालरापाटन।
मुनि श्री 108 निष्पक्ष सागर महाराज व निस्पृह सागर महाराज ने कहा कि जब तक दर्शन ज्ञान चरित्र के आगे सम्यक या समीचीन का उपयोग नहीं किया जाए तब तक इनका कोई महत्व नहीं है। दिगंबर जैन समाज के तत्वाधान में शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में शनिवार को आयोजित धर्म सभा में मुनिद्वय ने कहा कि दर्शन ज्ञान चरित्र सभी धर्म में और सभी मनुष्यों में पाया जाता है किंतु जब तक इनके साथ सम्यक या समीचीन का उपयोग नहीं किया जाए तब तक इनका कोई महत्व नहीं है। दर्शन ज्ञान चरित्र तो होना चाहिए किंतु हमें समीचीन की पालना करते हुए इसे प्राप्त करना है तभी हमारा उद्धार हो सकता है।
मनुष्य अपने कर्मों को दिन-रात पुण्य पाप में लगकर करता है। पुण्य पाप या फिर कम सिर्फ तन से नहीं किए जाते हैं अपितु मन वचन से होते हैं। जिसका परिणाम हमें भुगतना पड़ता है। इसीलिए जैन धर्म के सिद्धांत में साधुओं के लिए समीचीन सम्यकतव के साथ ही दर्शन ज्ञान चरित्र का महत्व बताया है।


उन्होंने कहा कि आचार्य विद्यासागर महाराज का आहार विहार न तो नियत होता था और ना ही नियोजित होता था। वह अपनी क्रियाएं आहार विहार आदि एक अतिथि की तरह संपादित करते थे। अतिथि अर्थात जिसकी कोई तिथि नहीं वह अतिथि। अतिथि कब आता है कब चला जाता है उसका कोई निश्चित नहीं होता इसीलिए उसको अतिथि कहा जाता है। उन्होंने कहा कि स्थानीय श्रावकों का भाग्य है कि उन्हें विरासत में उनके पुरखे संपदा से अभिभूत ऐसे कलात्मक शिखर के साथ शांतिनाथ मंदिर का निर्माण करवा कर छोड़ गए हैं। यहां की ऊर्जा वैभव, जिन मंदिर तथा जिन प्रतिमा बहुत ही सुंदर एवं मन को हरने वाली शांति प्रदाता है। यह एक तीर्थ क्षेत्र है। 




उन्होंने बताया कि आचार्य विद्यासागर महाराज ने उन्हें सिखाया की जब आप दीक्षा लेकर दिगंबर मुद्रा धारण कर रहे हो तो यह कोई साधारण मुद्रा नहीं है। आप एक चलते फिरते तीर्थ के समान हो जिसको पूरी दुनिया नमोस्तु करेगी इसलिए इसकी मर्यादा और इसका पालन समीचीन होकर सम्यक भाव से करना आवश्यक है। मंगलाचरण सोनल सेठी ने किया। कार्यक्रम का संचालन राजकुमार जैन बैंक वाला ने किया।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
