जीवन में सुख शांति की बड़ी जरूरत है आर्जव सागर महाराज
तारंगा
तारंगा जी में श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान सानंद सम्पन्न हुआ परम पूज्य आचार्य श्री 108 आर्जवसागर सभामंडप में हवन करते हुए आहुतियां_दी गई इसके उपरांत श्री जी की शोभायात्रा निकाली गई।
कार्यक्रम की बेला में सर्वप्रथम प्रातःकाल अभिषेक उपरांत गुरु मुख से शांतिधारा करने का सौभाग्य श्री मान कैलाशचंद जी हिमांशु जैन दीपांशु जैन एवं समस्त जौहरी परिवार एवं तनेजा परिवार गुड़गांव एवं योगेश भाई शाह अहमदाबाद को प्राप्त हुआ। तत्पश्चात इंजीनियर बहिन ऋषिका दीदी दमोह के द्वारा नित्य नियम देव शास्त्र गुरु पूजन, जिनवाणी पूजन एवं आचार्य भगवन् श्री आर्जवसागर जी महामुनिराज की पूजन कराई गई। पूजन उपरांत बाहर से आए हुए अतिथि एवं मुख्य पात्रों का सम्मान सिद्धक्षेत्र तारंगा कमेटी द्वारा किया गया।


इसी मांगलिक अवसर पर गुरुदेव का पाद प्रक्षालन एवं गुरु ससंघ के करकमलों में शास्त्र भेंट किया गया। तदोपरांत आचार्य भगवन् ने अपने मंगल प्रवचन के माध्यम से बताया कि जीवन में सुख शांति की बड़ी ही जरूरत है।प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक क्षण ही इसकी खोज करते रहते हैं।

भैया सच्चा सुख तो अपनी आत्मा में ही है।आत्मा को प्राप्त करने के लिए हमें कर्म रूपी बीज को जलाना पड़ेगा ;जिससे संसार का अंत होगा। और हम अपनी आत्मा को प्राप्त कर परमात्मा बन पाएंगे। मोक्ष प्राप्त कर पाएंगे।


आचार्य श्री ने धर्मप्रेमी बंधुओ! बोलते हुए कहा कि आप सभी पूर्ण रूप से सभी प्रकार की चिंताओं को दूर करने के लिए प्रभु के चरणों में आते हैं ;जहां पर आप सभी के लिए पूर्ण शांति -सुख का अनुभव होता है।
जीवन में आध्यात्मिक शांति -सुख का अन्य कोई दूसरा साधन नहीं है, मात्र मंदिर जी ही एक ऐसा साधन है; जिसमें प्रभु दर्शन से सच्ची शांति और सच्चा सुख प्राप्त होता है।
आचार्य श्री ने कहा कि दुख तीन तरह के होते हैं तन का दुख, मन का दुख, और धन का दुख।
धन तो जीवन में बहुत मिलता है। जैसे राजकुल में जन्म लेने वाले तीर्थंकरों को भी धन की कोई कमी नहीं थी। उनके काल में तो भूमि पर कोई भी जीव दीन -दरिद्र नहीं रहता था। हमेशा रत्नो की वर्षा होती रहती थी। सभी जीव खुशहाल पूर्वक अपना जीवन यापन करते थे। और सभी जीव राग द्वेष से दूर होकर सदैव संतुष्ट भी रहते थे।
फिर भी वह तीर्थंकर इस संसार की असारता को समझ कर अपनी आत्मा और शरीर के भेद विज्ञान को जानकर ऐसे अपार वैभव को छोड़कर… जिन दीक्षा (मुनिपद ) धारण कर लेते हैं।सभी तीर्थंकर जन्म से ही अनंत बल के धारी होते हैं। उनसे बलशाली अन्य दूसरा व्यक्ति नहीं होता है एवं उन्हें कोई हरा भी नहीं सकता। ऐसे जैन धर्म में 24 तीर्थंकर कह गए हैं जिनमें सभी में समान बल और समान शक्ति होती है।
आपके पास तो इतना उन तीर्थँकर के समान अपार धन वैभव भी नहीं है कि जिसे छोड़ने में आपको दुख हो।….फिर भी आपसे छोड़ नहीं जाता। आप सभी इस धन के पीछे दिन-रात क्या पूरा जीवन ही बिता देते हैं।और धर्म ध्यान को भूल जाते हैं। बंधुओ!धर्म को नहीं भुलाओ….उसे ध्यान में रखो। प्रतिदिन जिनेंद्र प्रभु वीतराग प्रभु की वाणी को गुरुओ के माध्यम सुनो और अमल में लाओ, जीवन को महान बनाओ।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
