एक ऐसे मुनि… जो बिना लेटे विश्राम करते हैं — जिसे जानकर वैज्ञानिक भी रह जाएं हैरान!” पंचम काल में चतुर्थ काल के मुनिवर के दर्शन!

धर्म

 “एक ऐसे मुनि… जो बिना लेटे विश्राम करते हैं — जिसे जानकर वैज्ञानिक भी रह जाएं हैरान!” पंचम काल में चतुर्थ काल के मुनिवर के दर्शन!

 

पंचम काल की इस भागदौड़ भरी, अत्याधुनिक दुनिया में यदि चतुर्थ काल जैसी तपश्चर्या के दर्शन हों — तो वह सचमुच आश्चर्य से कम नहीं।

ऐसे ही अद्भुत तपस्वी हैं —

 परम पूज्य आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी गुरुदेवजो वर्तमान में बरासो (भिंड) में विराजमान हैं।उनका संयम, त्याग और तप आज के युग के लिए प्रेरणा और विस्मय दोनों है। आइए, उनके दिव्य जीवन की झलक देखें —

✨ 1. लेटने का पूर्ण त्याग

ऐसे महान मुनीश्वर, जिन्होंने लेटकर सोने का त्याग किया है।वे पूरी रात्रि बैठे-बैठे ही विश्राम (निद्रा) पूर्ण करते हैं।आज जब कुछ घंटे की नींद कम हो जाए तो शरीर जवाब दे देता है — वहां यह तप साधारण नहीं, असाधारण है।

 2. आहार में अद्भुत नियम

आहार में केवल एक अनाज और एक हरी सब्जी का ही नियम।

न स्वाद की इच्छा, न विविधता की कामना —

केवल शरीर निर्वाह हेतु सीमित आहार।

 

 3. भीषण गर्मी में भी साधना

जहाँ सामान्य व्यक्ति पंखा, कूलर, एसी के बिना रहना कठिन समझता है,

वहाँ गुरुदेव ने इन सभी सुविधाओं का पूर्ण त्याग किया है।

तप की अग्नि में तपकर ही आत्मा का तेज प्रकट होता है।

 

4. आधुनिक साधनों का त्याग

इस डिजिटल युग में मोबाइल, लैपटॉप और तकनीकी साधन सामान्य आवश्यकता बन चुके हैं।

परंतु गुरुदेव ने इन सबका त्याग कर केवल आत्मचिंतन और स्वाध्याय को ही जीवन का साधन बनाया है।

 5. पिच्छी की पवित्र मर्यादा

गुरुदेव अपनी पिच्छी केवल प्रतिमाधारियों को ही प्रदान करते हैं।

पिच्छी की कोई बोली नहीं लगती —

यह श्रद्धा और पात्रता का विषय है, प्रदर्शन का नहीं।

 

 6. निरंतर त्याग और स्वाध्याय

उनका प्रत्येक क्षण त्याग, तप और शास्त्र अध्ययन में व्यतीत होता है।

वाणी में गंभीरता, आचरण में शुद्धता और जीवन में पूर्ण संयम।

 

 सचमुच…

पंचम काल में यदि चतुर्थ काल की तपश्चर्या के दर्शन हों —

तो वह केवल सौभाग्य नहीं, बल्कि आत्मजागरण का निमंत्रण है।

 

ऐसे महान तपस्वी गुरुदेव के चरणों में कोटि-कोटि वंदन।

        संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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