अहिंसा संस्कार पदयात्रा में आचार्य प्रसन्न सागरजी का संदेश: “जिन्दा रहना, जिन्दा लगना और जिन्दा होना — तीनों में है बड़ा अंतर”
औरंगाबाद/भीलवाड़ा।
अहिंसा संस्कार पदयात्रा के क्रम में अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय पियूष सागरजी महाराज इन दिनों दीक्षा भूमि परतापुर, बांसवाड़ा (राजस्थान) की ओर पदविहार कर रहे हैं। इसी श्रृंखला में आयोजित प्रवचन कार्यक्रम में आचार्य श्री ने उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए जीवन के गूढ़ विषय पर प्रेरक संदेश दिया।तीनों में बहुत फर्क है — जिन्दा रहना, जिन्दा लगना और जिन्दा होना”आचार्य श्री ने कहा कि जिन्दा रहना केवल सांसों का चलना नहीं है। व्यक्ति जीते-जी और मृत्यु के बाद भी तभी लोगों के दिलों में जीवित रहता है, जब वह प्रेम, सेवा, दान, परोपकार और त्यागपूर्ण जीवन जीता है। ऐसा जीवन ही सच्चे अर्थों में अमरता प्रदान करता है।
उन्होंने कहा कि जिन्दा लगना उस जीवन को कहते हैं, जो बिना इच्छा और उत्साह के जिया जाता है। जब व्यक्ति परिस्थितियों या अपनों से हार जाता है, तब वह केवल जीवित प्रतीत होता है, वास्तव में जीवन का आनंद और उद्देश्य उससे दूर हो जाता है।
“जिन्दा हूं जिस तरह की गमे, ज़िन्दगी नहीं,
जलता हुआ दीया हूं, मगर रौशन नहीं।”



आचार्य श्री ने समझाया कि जैसे अच्छा बिताया गया दिन सुखद नींद लाता है, वैसे ही अच्छे कर्मों से जिया गया जीवन सुखद मृत्यु का मार्ग प्रशस्त करता है।
वहीं जिन्दा होना का अर्थ है जिन्दादिल होना — सेवा, करुणा, सद्भाव, प्रेम, उदारता, भक्ति और समर्पण में अग्रणी रहना।
“जिन्दा होना यानि लोगों के दिलों में बस जाना और सबका भरोसेमंद बन जाना,” 


25 फरवरी को भीलवाड़ा में होगा मंगल पदविहार
अहिंसा संस्कार पदयात्रा के अंतर्गत 25 फरवरी 2026, बुधवार को प्रातः 6:30 बजे पदविहार द ब्रेन वैली मॉर्डन स्कूल, काछोला (मांडलगढ़ रोड), जिला भीलवाड़ा से प्रारंभ होकर महुआ, जिला भीलवाड़ा स्थित दिगम्बर जैन मंदिर (चारभुजा मंदिर के सामने, पोस्ट ऑफिस के पास) तक लगभग 11.5 किलोमीटर का होगा।
पदयात्रा दिशा: नीमच, अंदेश्वर पार्श्वनाथ तीर्थ क्षेत्र होते हुए परतापुर, बांसवाड़ा (राजस्थान) की ओर अग्रसर है।
नरेंद्र अजमेरा एवं पियूष कासलीवाल (औरंगाबाद) से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया (रामगंजमंडी) 9929747312
