मोबाइल फोन का उपयोग सुई की नोक के बराबर हो रहा है जबकि दुरूपयोग अनंत हो रहा है आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज
करनाल
दिगंबर जैन सोसाइटी करनाल द्वारा पंच कल्याणक महोत्सव मनाया जा रहा है। इसमें आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने बताया कि भेद विज्ञान बताता है कि शरीर और आत्मा दोनों पृथक-पृथक होते हैं। आत्मा शाश्वत व शरीर क्षण भंगुर होता है। आत्मा शरीर के बराबर होती है व शरीर के प्रत्येक क्षेत्र में आत्मा का वास होता है। नख और केशों को छोड़कर, जब आत्मा किसी भी शरीर को छोड़ती है तो तीन समय के अंदर वह दूसरी देह को धारण कर लेती है। मानव के कर्म कुछ समय के लिए सुख के लिए हो सकते हैं, लेकिन वह अज्ञानता के कारण अनंत भवों को दुख की भट्टी में झोंक देता है और दुर्गति का पात्र बनता है।
आचार्य ने बताया कि कर्मों का पूर्ण क्षय/समाप्त होना ही मोक्ष है। कैवल्य ज्ञान होने के कारण मोक्ष सुख प्राप्त होता है और इसी में अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन और अनंत सुख होता है औरफिर मोक्ष प्राप्त आत्मा कभी जन्म नहीं लेती और जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाती है। मानव का धन, सम्पदा परिवार व सगे संबंधियों के अतिरिक्त अपनी देह से सर्वाधिक राग होना है। इसके प्रति प्रायः उसकी तीव्र आशक्ति होती है। वह शरीर की तो सुनता है उसकी मानता भी है, लेकिन इसमें विराजी चेतन्य आत्मा की न तो सुनता है और न ही उसकी मानता है। यदि वह अपनी आत्मा की प्रेरणा, चिंतन और दिशा को जान ले तो संसार के सभी दुखों से बच सकता है।


आत्मा की नहीं सुनने से ही हिंसा, भ्रष्टाचार, दुराचार और तमाम तरह के अपराध होते हैं। उन्होंने कहा आत्मा की सुनने के लिए स्वाध्याय, मौन, ध्यान करना चाहिए। इससे ही मन की चंचलता रोकी जा सकती है। 


मोबाइल फोन का जिक्र करते हुए आचार्य ने बताया कि इसका लाभ सुई की नोंक के बराबर हो रहा है, जबकि दुरुपयोग अनंत हो रहा है। बच्चे इसके सबसे अधिक शिकार हो रहे हैं। इससे संस्कार विहीन समाज की रचना हो रही है, जो राष्ट्र, धर्म, समाज और परिवार के लिए चिंता का विषय बन गया है।


संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
