वीरोंदय तीर्थ क्षेत्र में ऐतिहासिक प्रसिद्धि जैन नौगामा अक्षत जैन भरडा का हुआ चक्रवर्ती विवाह,   राजस्थान की धरा पर भव्य आयोजन बना श्रद्धा और संस्कृति का अद्भुत संगम

धर्म

वीरोंदय तीर्थ क्षेत्र में ऐतिहासिक प्रसिद्धि जैन नौगामा अक्षत जैन भरडा का हुआ चक्रवर्ती विवाह,   राजस्थान की धरा पर भव्य आयोजन बना श्रद्धा और संस्कृति का अद्भुत संगम

वीरोंदय

वीरोदय तीर्थ क्षेत्र के इतिहास में पहली बार चक्रवर्ती विवाह का आयोजन अत्यंत भव्यता, धार्मिक विधि-विधान और जैन परंपराओं के अनुरूप संपन्न हुआ। यह आयोजन न केवल तीर्थ क्षेत्र के लिए गौरव का विषय बना, बल्कि जैन समाज के लिए भी एक प्रेरणादायक और ऐतिहासिक क्षण रहा। इस पावन अवसर पर चक्रवर्ती विवाह के नायक-नायिका बने पं. प्रदीप जैन की सुपुत्री प्रसिद्धि जैन नौगामा बांसवाड़ा राजस्थान एवं भरड़ा मनोज जैन के सुपुत्र अक्षत जैन। दोनों का यह चक्रवर्ती विवाह अत्यंत अनुकरणीय, अनुमोदनीय तथा धार्मिक गरिमा से परिपूर्ण रहा।

 

 

विवाह का शुभारंभ प्रातः काल आदिनाथ भगवान की भक्ति एवं मंगलाचरण के साथ हुआ। जैन परंपरा में विवाह को केवल सामाजिक आयोजन नहीं बल्कि एक धर्म-संस्कार माना जाता है। इसी भावना के साथ इस विवाह में सबसे पहले भगवान आदिनाथ की पूजा-अर्चना, दीप प्रज्वलन, मंगल पाठ एवं आशीर्वचन की प्रक्रिया संपन्न की गई। इसके पश्चात आयोजन में अत्यंत भव्यता देखने को मिली जब दूल्हा पक्ष की ओर से हाथी पर सवार होकर वर की शाही शोभायात्रा निकाली गई। हाथी पर सवारी का उद्देश्य केवल भव्यता नहीं, बल्कि यह संदेश देना भी है कि जीवन के प्रत्येक कदम पर धर्म, संयम और मर्यादा का पालन करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।

चक्रवर्ती विवाह की विशेषता यह होती है कि इसमें विवाह को आध्यात्मिक एवं धार्मिक स्वरूप दिया जाता है। जैन धर्म में इस विवाह का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह केवल वर-वधु के बंधन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवार, समाज और धर्म की सहभागिता से संस्कार को मजबूत करता है। इस विवाह में पारंपरिक जैन विधियों के अनुसार मंगलाचरण, वर-वधु मिलन, सप्तपदी, वचन-प्रतिज्ञा, एवं धर्म लाभ जैसी विधियां संपन्न की जाती हैं। साथ ही विवाह में सात वचन या प्रतिज्ञाएं केवल गृहस्थ जीवन के लिए नहीं बल्कि अहिंसा, सत्य, संयम, सदाचार और परोपकार के पालन हेतु भी ली जाती हैं।

दोपहर की बेला में इस आयोजन का मुख्य आकर्षण रहा भक्तांबर विधान। भक्तांबर विधान जैन धर्म की एक अत्यंत पवित्र धार्मिक प्रक्रिया है, जिसमें भक्तांबर स्तोत्र का पाठ, मंत्रोच्चार और विधान पूजन के माध्यम से भगवान आदिनाथ की विशेष आराधना की जाती है। इसका उद्देश्य जीवन में आने वाली बाधाओं का नाश, दांपत्य जीवन में मंगल, सुख-शांति एवं आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करना होता है। इस विधान के साथ जब विवाह संस्कार संपन्न हुआ, तो यह विवाह केवल सामाजिक रस्म न रहकर धर्ममय ऐतिहासिक आयोजन बन गया।

जैन धर्म में चक्रवर्ती विवाह का संदेश यह है कि गृहस्थ जीवन भी धर्म से जुड़कर जिया जा सकता है। यह विवाह दुनिया को यह सिखाता है कि विवाह केवल दिखावा या भोग-विलास नहीं होना चाहिए, बल्कि यह दो आत्माओं का ऐसा बंधन हो जिसमें संयम, शुद्ध आचरण, परस्पर सम्मान और धार्मिकता बनी रहे। चक्रवर्ती विवाह यह प्रेरणा देता है कि दांपत्य जीवन में प्रेम के साथ-साथ कर्तव्य, संस्कार, सेवा और सद्भाव भी आवश्यक हैं।

 

इस आयोजन के माध्यम से समाज को यह संदेश भी जाता है कि परंपराओं को आधुनिकता के साथ जोड़ते हुए भी धर्म का पालन संभव है। जैन धर्म का मूल सिद्धांत अहिंसा परमोधर्मः है और चक्रवर्ती विवाह उसी अहिंसा, सदाचार और शुद्धता की भावना को मजबूत करता है। यह विवाह बताता है कि जब जीवन की शुरुआत भगवान के आशीर्वाद से होती है, तो परिवार में संस्कार मजबूत होते हैं और समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

 

वीरोंदय तीर्थ क्षेत्र की शांत प्रकृति, पावन वातावरण और आदिनाथ भगवान के आशीर्वाद के साथ यह चक्रवर्ती विवाह सचमुच अलौकिक और अविस्मरणीय बन गया। इस शुभ अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं एवं समाजजनों ने इस विवाह को ऐतिहासिक बताते हुए वर-वधु को उज्ज्वल भविष्य का आशीर्वाद दिया।

 

 

अंत में समस्त समाज की ओर से प्रसिद्धि  एवं अक्षत  को चक्रवर्ती विवाह की हार्दिक शुभकामनाएं एवं मंगलकामनाएं। यह विवाह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बने, तथा जैन धर्म के आदर्शों को नई दिशा प्रदान करे। इस अनुकरणीय चक्रवर्ती विवाह में सृष्टि श्री प्रदीप जैन द्वार दशा हुमड समाज द्वारा पारित प्रस्ताव में दिन में शादी दिन में भोज का पालन करते हुए बड़ी शालीनता के साथ बैठक में भोजन करा कर एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।

    सुरेशचंद गांधी नौगांव से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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