_याचना तो दूर, संकेत तक नहीं देते

आचार्य श्री विद्यासाग़र महाराज

_याचना तो दूर, संकेत तक नहीं देते : आचार्य श्री विद्यासागर महाराज 

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 कुण्डलपुर, (दमोह, मध्यप्रदेश)

मई 2016 का प्रसंग है। एक दिन स्वाध्याय करते-करते आचार्यश्रीजी ने पेंसिल उठाई, उसे देखा और रख दिया। यह दृश्य सामने कुछ दूरी पर आचार्यश्रीजी से चर्चा करने के भाव से प्रतीक्षा कर रहीं दो ब्रह्मचारिणी बहनों ने देखा। उन्हें समझते देर न लगी, उन्होंने तुरंत जाकर संघस्थ मुनिश्रीजी को बताया कि संभवतः गुरुजी कुछ लिखना चाह रहे हैं, पर पेंसिल व्यवस्थित (नोंक) न होने से उन्होंने लिखा नहीं। मुनिश्री ने तत्काल ही पेंसिल लाकर गुरुजी को दे दी।

 

आचार्यश्रीजी ने उन्हें बड़े ही आश्चर्य से देखा कि इन्हें कैसे ज्ञात हुआ ? जब उनकी दृष्टि सामने कुछ दूरी पर प्रतीक्षारत उन बहनों पर गई, तब वह समझ गए और मुस्करा दिए। बाद में उन मुनिश्री ने बताया कि आचार्यश्रीजी कभी भी किसी वस्तु के लिए इशारा भी नहीं करते हैं। संघस्थ ज्येष्ठ साधु प्राय:कर गुरुजी का बाजौटा (चौका) व्यवस्थित कर देते हैं। इसके बावजूद भी कई बार तीन-तीन, चार-चार दिन तक गुरुजी का लेखन कार्य रुका रहता।

 

उन्होंने बताया एक बार तीन-चार दिन से गुरुजी का लेखन कार्य रुका हुआ देखकर सहजता से किसी ने पूछ लिया, “आचार्यश्रीजी! क्या आपका लेखन कार्य पूर्ण हो गया ?’ आचार्यश्रीजी ने न तो ‘हाँ’ कहा और न ही ‘ना’ । उपदेशात्मक शैली में बोले- ‘योग्य उपादान और योग्य निमित्त के मिलने पर कार्य की सिद्धि होती है। निमित्त के अभाव में नैमित्तिक का भी अभाव हो जाता है।

 

 

प्रत्येक कार्य का कारण होता है। कारण मिलने पर कार्य सिद्ध होता है। बाद में ज्ञात हुआ कि आचार्यश्रीजी के बाजौटे पर पेंसिल नहीं रखी थी।

जब पेंसिल साफ़ करके उनके चौके पर रख दी।| तब लेखन कार्य पुनः प्रारंभ हो गया। धन्य है। गुरुवर की धैर्य एवं गंभीरता की पराकाष्ठा। लेखन कार्य रोक दिया, पर आगम की आज्ञा, अचौर्य महाव्रत की भावना रूप अयाचकवृत्ति का पालन पूर्ण निष्ठा से किया |

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