मुल्तान शहर (पाकिस्तान) का 170 साल पुराना जैन मंदिर आस्था, त्याग और चमत्कार की अमर गाथा
कभी मुल्तान (आज का पाकिस्तान) में एक भव्य, 170 वर्ष प्राचीन जैन मंदिर खड़ा था—अद्भुत शिल्पकला, दिव्य चित्रों और 24 तीर्थंकरों की अनुपम प्रतिमाओं से सुसज्जित।1885 में 63,000 रुपये की लागत से निर्मित यह मंदिर सिर्फ मूर्तियों का घर नहीं था—यह जिनशासन की धड़कन और संस्कृति की धरोहर था।

✉️ आचार्यकल्प पंडित टोडरमल जी द्वारा मुल्तान जैन मंदिर को लिखी गई वह रहस्यपूर्ण चिट्ठी, जो उनके द्वारा रचित अद्भुत शास्त्र “मोक्षमार्ग प्रकाशक” की अभिन्न अंग बन चुकी हैं ।

जैन परंपरा में प्रचलित है कि मुल्तान का यह प्राचीन जैन मंदिर जब अपने उत्कर्षकाल में था, तब समुदाय के प्रमुख श्रावकों ने आचार्यकल्प पंडित टोडरमल जी से मार्गदर्शन का निवेदन किया था। उसी समय टोडरमल जी ने एक विशेष चिट्ठी इस मंदिर के नाम लिखी— एक ऐसी चिट्ठी, जिसे बाद के वर्षों में धर्म की रक्षा का आधार माना गया, जो आज मोक्ष मार्ग प्रकाशक में उल्लेखित है ।

😢 1947 — बंटवारे का वह काला साया
ट्रेनों पर मौत का साया, घरों पर उजाला मिटता हुआ, और इंसानियत अपनी ही परछाई से डरती हुई…इन्हीं भयावह दिनों में मुल्तान के जैन समुदाय के मन में एक ही प्रश्न गूंज रहा था—“हम कोई मार्ग ढूँढ लेंगे… पर हमारे भगवान? हमारी जिनवाणी?”
🙏 85 दिव्य मूर्तियों को बचाने का संकल्प
समुदाय के पास थीं—85 प्राचीन जैन प्रतिमाएँ और जिनवाणी,
जो उनके जीवन की आत्मा थीं।दंगे बढ़ते गए, रास्ते बंद होते गए।
दिल्ली से विमान न मिला, मुंबई से आशा क्षीण होती लगी।आख़िरकार एक निजी विमान मिला… 400 रुपये प्रति व्यक्ति में।प्रतिमाएँ, जिनवाणी, और श्रावक—सब एक-एक कर विमान में पहुंचे।

💔 पायलट की व्यथित करने वाली घोषणा
विमान डबल-लोडेड है।या तो लोग जा सकते हैं… या प्रतिमाएँ।”उस क्षण जो हुआ, वह इतिहास में सुनहरी अक्षरों में लिखा जाना चाहिए—जैन श्रावक, जिनके हृदय में भगवान के प्रति अनन्य भक्ति थी,
एक स्वर में, दृढ़ संकल्प और कंपित भाव से बोले—यदि आवश्यकता पड़े… हमें यहीं छोड़ देना।पर भगवान और जिनवाणी सुरक्षित अवश्य पहुँचनी चाहिए।”यह शब्द आँसुओं से भी अधिक गहरे थे…ये त्याग के नहीं—समर्पण के शब्द थे।पायलट अवाक् रह गया।उसने महसूस किया कि ऐसे श्रद्धालुओं को पीछे छोड़ देनामानवता के विरुद्ध होगा।और उसने निर्णय लिया—“लोग भी जाएंगे… और भगवान भी।”यह निर्णय उसने अपनी जान जोखिम में डालकर लिया।



✨ आकाश में प्रकट हुआ अद्भुत चमत्कार
जैसे ही विमान ने उड़ान भरी—सभी जैन श्रावक णमोकार मंत्र का जाप करने लगे।उनके स्वर में न भय था, न संदेह—वह बस आस्था की अनंत प्रतिध्वनि थी।श्रेणीबद्ध भाव से उन्होंने संकल्प लिया—“जोधपुर पहुँचने तक जल-कण भी ग्रहण नहीं करेंगे।”विमान, जो उड़ना ही नहीं चाहिए था…जो अत्यधिक भार से भरा हुआ था…वह आकाश में ऐसे तैरता गया जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने उसे संभाल रखा हो।

जोधपुर पहुँचे तो पायलट स्तब्ध था—
“इतना भार होने के बाद भी विमान इतना हल्का कैसे लगा?
यह निश्चित ही चमत्कार है!”

आज वे प्रतिमाएँ कहाँ हैं?
जयपुर, आदर्श नगर स्थित ‘मुल्तान जैन मंदिर’ में सुरक्षित।वहाँ पहुँचकर लोग सिर्फ प्रतिमाएँ नहीं देखते—वे देखते हैं—आस्था का इतिहास बंटवारे की पीड़ा श्रावकों का त्यागऔर वह चमत्कार जिसे समझना मानव बुद्धि से परे है।
मुल्तान का मूल मंदिर आज
आज पाकिस्तान के मुल्तान में जहाँ कभी यह मंदिर खड़ा था,वहाँ अब मदरसा चलता है।परन्तु उसकी दीवारें आज भी मौन होकर कहती हैं—हमने आस्था को युगों-युगों तक जीवित देखा है…हम त्याग की पराकाष्ठा के साक्षी रहे हैं।” यह सिर्फ एक मंदिर की कहानी नहीं यह एक सभ्यता, एक धर्म, एक विश्वास का अमर गीत है। यह बताती है कि—जब आस्था बोलती है, तो चमत्कार घटित होते हैं।
यदि आप कभी जयपुर जाएँ—मुल्तान जैन मंदिर, आदर्श नगर के दर्शन अवश्य करें।वहाँ आपको मिलेगा—मुल्तान के श्रावकों का अमर त्याग जिनवाणी की रक्षा का अद्भुत इतिहास स्थान: मुल्तान जैन मंदिर, आदर्श नगर, जयपुर
विशेष: 1947 में मुल्तान से सुरक्षित लाई गई 85 दिव्य प्रतिमाएँ
ऐसी गाथाएँ सिर्फ सुनाई नहीं जातीं—पीढ़ियों तक प्रेरणा बनकर जीती रहती हैं।
सुलभ जैन (बाह) – जैन धर्म तीर्थ यात्रा से प्राप्त संकलन के साथ अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
