आर्यिका 105 शीतलमति माताजी ने श्रुत को वर्धमान कर शीतल करने का स्वर्णिम सफर।जल के अतिरिक्त शेष सभी आहार सामग्री का त्याग

धर्म

आर्यिका 105 शीतलमति माताजी ने श्रुत को वर्धमान कर शीतल करने का स्वर्णिम सफर।जल के अतिरिक्त शेष सभी आहार सामग्री का त्याग

निवाई

परमपूज्य 83 वर्षीय आर्यिका105 श्री शीतल मति जी के माध सुदी 5 पंचमी सन 1972 अनुसार 54 वे दीक्षा वर्ष दिवस पर कोटिश वन्दामिप्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महामुनिराज की अक्षुण्ण मूल बालब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के प्रथम पट्टाधीश आचार्य श्री वीर सागर जी के अंतिम मुनिशिष्य आचार्यकल्प श्री श्रुत सागरजी से माध सुदी पंचमी वर्ष 1972 में दीक्षित 83 वर्षीय आर्यिका श्री शीतलमति ने परंपरा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री वर्धमान सागर के समक्ष जल के अतिरिक्त सभी पदार्थों का त्याग निवाई में दिनांक 19 जनवरी 2026 को किया। पूज्य आर्यिका श्री शीतल मति माताजी ने आचार्य श्री एवं संघ के सभी साधुओं से क्षमा याचना की इस अवसर पर आर्यिका श्री शीतल मति जी ने संक्षिप्त उद्बोधन में सभी पूर्वाचार्यों को ,दीक्षागुरु आचार्य कल्प श्री श्रुतसागर जी को स्मरण आचार्य भक्ति पूर्वक कहा कि मैं आचार्य शिवसागर जी के समय से संघ में हूं ।आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संलेखना भावना रूपी नैया पार करा दो गुरु संघ सानिध्य में में सभी प्रकार के परिग्रह का त्याग कर धार्मिक भक्ति संग्रह गुटका रखूंगी । अगले आहार में मात्र जल ही लूंगी । संघ में 60 वर्ष हो गए हैं किसी के प्रति राग द्वेष कषाय मोह उत्पन्न हुआ हो ,कोई गलती हुई हो तो आचार्य श्री एवं समस्त साधुओं सहित सबसे क्षमा याचना करती हूं । आचार्य पद पर आचार्य श्री को 36 साल हो गए हैं गुरुवर के सानिध्य में मेरी समाधि हो ,आत्मा की उन्नति हो, आचार्य श्री मुझे क्षमा करें।।इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने श्री शीतलमति जी को संबोधित कर बताया कि श्रीमद् जैन धर्म में जन्म के बाद मृत्यु को कैसे विजय प्राप्त कर वरण किया जाता है, इसका वर्णन है। गुरु की शरण में मृत्यु पर विजय का मार्ग प्राप्त होता है,भव्य जीव दीक्षा लेकर आत्मा को परम पावन करता है। उपसर्ग,रोग के कारण शरीर के प्रति ममत्व हटाकर अनेक आत्म साधकों ने आत्मा को सिद्ध करने का प्रयास किया है। श्री शीतलमति जी भी सल्लेखना समाधि की आत्मसाधना कर रही है।उनके दीक्षा गुरु श्री श्रुतसागर जी ने भी आत्म साधना धैर्य पूर्वक की थी।माता जी के समक्ष भी अनेक साधकों ने जीवन को सार्थक करने का पुरुषार्थ किया है।आज के बाद माताजी केवल आहार में जल लेगी, अन्य सभी पदार्थों का उन्होंने त्याग कर दिया है ।आत्म साधकों की भावना उत्कृष्ट होती है अंतरंग और बहिरंग तप में साधक ममत्व,मोह और कषाय को हटाता है संघ परंपरा में आचार्य धर्मसागर जी सहित अनेक साधकों ने क्रमशः त्याग किया है माताजी ने सभी साधकों को निकट से देखा है माता जी की साधना शांतिपूर्वक सफल हो ऐसी मंगल भावना करते हैं

सामान्य परिचय

गामड़ी जिला डुंगरपुर में श्रीमती झकु देवी श्रेष्ठी न्याल चंद जी धाटलियाकी पुत्री गेंदी देवी का जन्म सन 1943 में हुआ। आपका विवाह श्री गोवर्धन लाल पचौरी से हुआ। आप द्वितीय पट्टाचार्य आचार्य श्री अजित सागर जी से समय से संघ में आर्यिका श्री ज्ञानमती जी की प्रेरणा से शामिल हुई। आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत और 2 प्रतिमा के नियम आचार्य श्री शिव सागर जी से ग्रहण किए आपने दीक्षा गुरु आचार्य कल्प श्री श्रुत सागर जी से 1971 में क्षुल्लिका ओर सन 1972 में आर्यिका दीक्षा लेकर आर्यिका श्री शीतल मति हुई। आपके शिक्षा गुरु आचार्य श्री अजित सागर जी हैं आप आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघस्थ हैं विगत वर्षों से क्रमश आहार की सामग्री में त्याग कर 19 जनवरी 2026 से दो उपवास के बाद मात्र जल ले रही हैं ।आप संलेखना समाधि की ओर दृढ़ता से अग्रसर हैं

राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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