संयुक्त परिवार में आर्थिक झंझावात से मुक्त थे प्रसन्न सागर महाराज
जयपुर
अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा वृक्ष की डाल से टूटते हुये पत्ते ने कहा -बोझ बन जाओगे तो अपने भी गिरा देंगे..! घर परिवारों में लम्बे समय बाद देखने और सुनने को मिल रहा है कि एक छत के नीचे रहने वाले लोग भी अपने आपको अकेला महसूस करने लगे हैं। अपने संग साथ रहने वाले लोग भी यात्री और अतिथि जैसे हो गये हैं। रिश्ते सौदा बनकर रह गए।
घर-परिवार में अपने ही अपनों का शोषण करने लगे। इसलिए आज हमारे घर परिवारों से माता बहिने बाहर निकल आई है। घर से बाहर निकलने के दो कारण है — एक आर्थिक व्यवस्था और दूसरा अकेलापन। माता बहिने कितना ही पैसा कमा ले लेकिन उनकी ज़िन्दगी से संघर्ष और शोषण कम नहीं हुआ। तभी हमारे बड़े बुजुर्गों ने संयुक्त परिवार की व्यवस्था बनाई थी और हम आप उनकी वरदानी छांव में हँसते मुस्कुराते निश्चिंत होकर, तब दिन ही नहीं – वर्ष भी नहीं – पीढियां जैसे पल में बड़ी खड़ी हो जाती थी। जैसे-जैसे परिवार बढ़ता, पुराने मकानों में, नये हिस्से जुड़ते जाते। ना सुरक्षा की कमी लगती, ना अकेलापन और ना मन को सहारों की जरूरत पड़ती थी।
अब-जब घर परिवारों में – ये तेरा, ये मेरा का नज़रिया बदला और देखा देखी के प्रभाव ने जड़े जमाना यूं शुरू किया कि पुराने मजबूत वृक्षों की जड़ो में जैसे – मट्ठा पड़ गया हो। *निजी स्वार्थ और लोभ-लालच के प्रभाव ने घर परिवारों से मन के रिश्तों को खत्म कर दिया। इसलिए आज कोई भी किसी भी रिश्तों में आत्मीय अपनापन का स्वाद नहीं है। आज के रिश्ते मैगी जैसे हो गये हैं।
संयुक्त परिवार से इतने लाभ थे जैसे —
संयुक्त परिवार में एक जुटता दिखती थी।बड़े-बुजुर्गों की अनुभव की बातें सुनने को मिलती थी।कहीं भी आने जाने की स्वतन्त्रता थी।घर के सभी बच्चों के लिये एक जैसा माहौल रहता था।
संयुक्त परिवार में आर्थिक झंझावात से मुक्त थे।इसलिए मन बार बार यह गीत गाता है —
गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा – हाफिज खुदा तुम्हारा…!!!
नरेंद्र अजमेरा पीयूष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312






