स्व विवेक से किया कार्य ही सार्थक परिणाम देता है -विहसंत सागर*
मुरैना
विवेकपूर्ण व्यक्ति संसार में यश प्राप्त करते हैं और अविवेकी व्यक्ति उपहास के पात्र बनते है । किसी भी कार्य को करने से पूर्व व्यक्ति को अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए । सांसारिक क्रियाओं में विवेक का उपयोग तो आवश्यक है ही, साथ ही जब भी हम पूजा पाठ जाप तप या कोई धार्मिक अनुष्ठान करें, तब भी हमें स्व विवेक का उपयोग करना चाहिए । कहीं ऐसा न हो कि हम अच्छे के लिए कर रहे हैं और बुरा हो जाए । जब भी हम मंदिर जी या घर में कोई अनुष्ठान करें तब आसन को यथास्थान रखें, दृव्य सामग्री को यथास्थान ही चढ़ाए, आरती के पश्चात दीपक को इस तरह रखें कि जीव हिंसा न हो ।
जैन दर्शन में स्वविवेक को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, जो सम्यक् ज्ञान (सही ज्ञान) और सम्यक् चारित्र (सही आचरण) के साथ मिलकर मोक्ष मार्ग का आधार बनता है । यह सिर्फ बाहरी नियमों का पालन नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य जैसे पंचमहाव्रतों के पालन में निर्णायक भूमिका निभाता है । जहाँ व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार सही-गलत का भेद कर, आत्मा के कल्याण के लिए उचित-अनुचित का चुनाव करता है । स्वविवेक के माध्यम से आत्मा बंधनों से मुक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त करती है, जिससे मोक्ष संभव होता है ।सम्यक् ज्ञान का आधार केवल जानकारी (ज्ञान) नहीं, बल्कि सही निर्णय लेने की शक्ति है, जिससे आत्मा को ‘सम्यक् ज्ञान’ प्राप्त होता है।

पानी छानना सिर्फ विधि नहीं, बल्कि स्वविवेक से जीवों की रक्षा का तरीका है, जहाँ वस्त्र से छानना सबसे श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि प्लास्टिक या अन्य तरीकों में मृत जीव भी रह सकते हैं । जैन दर्शन में स्वविवेक एक आंतरिक ज्योति है जो व्यक्ति को अपने और आत्मा के हित में सही-गलत का चुनाव करने और परम सुख (मोक्ष) तक पहुँचने में मार्गदर्शन करती है । उक्त उद्गार गणाचार्यश्री विरागसागरजी महाराज के शिष्य मेडिटेशन गुरु उपाध्याय विहसंतसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिरजी में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए ।


पूज्य उपाध्याय श्री ने कहा कि जैन दर्शन में स्वविवेक को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, जो सम्यक् ज्ञान (सही ज्ञान) और सम्यक् चारित्र (सही आचरण) के साथ मिलकर मोक्ष मार्ग का आधार बनता है । यह सिर्फ बाहरी नियमों का पालन नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य जैसे पंचमहाव्रतों के पालन में निर्णायक भूमिका निभाता है । जहाँ व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार सही-गलत का भेद कर, आत्मा के कल्याण के लिए उचित-अनुचित का चुनाव करता है । स्वविवेक के माध्यम से आत्मा बंधनों से मुक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त करती है, जिससे मोक्ष संभव होता है ।सम्यक् ज्ञान का आधार केवल जानकारी (ज्ञान) नहीं, बल्कि सही निर्णय लेने की शक्ति है, जिससे आत्मा को ‘सम्यक् ज्ञान’ प्राप्त होता है।
पानी छानना सिर्फ विधि नहीं, बल्कि स्वविवेक से जीवों की रक्षा का तरीका है, जहाँ वस्त्र से छानना सबसे श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि प्लास्टिक या अन्य तरीकों में मृत जीव भी रह सकते हैं । जैन दर्शन में स्वविवेक एक आंतरिक ज्योति है जो व्यक्ति को अपने और आत्मा के हित में सही-गलत का चुनाव करने और परम सुख (मोक्ष) तक पहुँचने में मार्गदर्शन करती है ।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312


