दिगम्बर जैन मुनियों की आहारचर्या में झलकता है तप, त्याग और अनुशासन दिगम्बर जैन संत की वैय्यावृत्ति करने से अक्षय पुण्य का बन्ध होता है – आचार्य वर्धमान सागर महाराज 

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दिगम्बर जैन मुनियों की आहारचर्या में झलकता है तप, त्याग और अनुशासन दिगम्बर जैन संत की वैय्यावृत्ति करने से अक्षय पुण्य का बन्ध होता है – आचार्य वर्धमान सागर महाराज 

निवाई –

शीतकालीन प्रवास के चलते निवाई के सन्त निवास नसिंया जैन मंदिर पर विराजमान आचार्य वर्धमान सागर महाराज लगभग 33 पिच्छिका का मंगलवार को विधिवत पूजन अभिषेक नियम विधि के साथ पड़गाहन आहारचर्या प्रक्रिया का शुभारंभ हुआ जिसमें जैन समाज के श्रद्धालुओं द्वारा आचार्य भक्ति पूर्वक घर घर आहारचर्या के साथ मंगलाचार किया गया।

 

 

जैन समाज के मीडिया प्रभारी सुनील भाणजा एवं विमल जौंला ने बताया कि आचार्य श्री का संध आहार ग्रहण से पूर्व मुनिराज भगवान के समक्ष संकल्प लेते हैं। दिगम्बर मुनिराज कलश, श्री फल, सेव, मोसमी, संतरा, अनार, अष्ट द्रव्य, या खाली हाथ मिलने का प्रण करते हैं। इसके बाद जैन मुनि अपना बायां हाथ कंधे पर रखकर आहार के लिए निकलते हैं।

दिगम्बर जैन संत को भोजन देने से पहले श्रावक अपने शुद्ध संकल्प की घोषणा करते हैं उसके बाद जैन मुनियों को लकड़ी के पटिए पर तीन इंच ऊंचा खड़ा किया जाता है उसके बाद भोजन का शोध प्रक्रिया चलती है और आहार अंजुलि में दिया जाता है किसी बर्तन का उपयोग नहीं किया जाता।

इस दौरान आचार्य वर्धमान सागर महाराज एवं हितेन्द्र सागर महाराज की आहारचर्या करवाने का सौभाग्य समाजसेविका पिस्तौल देवी, नगरपालिका उपाध्यक्ष जितेन्द्र कुमार गजेन्द्र कुमार चंवरिया , लाड़ देवी गोपाल लाल शंभु कठमाणा, कमलेश देवी सन्मति कुमार मोहित चंवरिया आदि अनेक पुण्यशाली परिवारों को सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। मीडिया प्रभारी विमल जौंला एवं सुनील भाणजा ने बताया कि दिगम्बर सन्त कठोर नियमों का पालन करते है। दिगम्बर सन्त आहार चर्या में 36 प्रकार के अन्तर्राय नियमों का पालन करते हैं। यदि भोजन के दौरान कोई मृत जीव दिखाई दे, बाल भोजन में गिर जाए या रुदन जैसी स्थिति उत्पन्न हो तो उस श्रावक के घर आहार प्रक्रिया रोक दी जाती है। कई मुनि आहार देने वाले श्रावकों से विशेष व्रतों का का संकल्प करवाते हैं जिनमें रात्रि भोजन त्याग, कंद मूल का परहेज, बाहर के भोजन पानी से दूरी, और ब्रह्राचर्य पालन प्रमुख हैं। उन्होंने बताया कि शीतकालीन प्रवास के तहत निवाई में आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज संसध संयम, तप और अनुशासन का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। आधुनिक समय में भी इन मुनियों की आहारचर्या भारतीय अध्यात्म और आत्म संयम की परम्परा को सजीव बनाए हुए हैं। इस अवसर पर आचार्य वर्धमान सागर महाराज ने कहा कि दिगम्बर संतों का नगर में आना त्योहार जैसा हो जाता है जैन संत शीतकालीन प्रवास हो या वर्षायोग एक जगह रहकर तप और त्याग की साधना करके अपना मोक्ष मार्ग प्रशस्त करते हैं। उन्होंने कहा कि दिगम्बर जैन संत की वैय्यावृत्ति करने से अक्षय पुण्य का बन्ध होता है। इसलिए हर प्राणी को भगवान की भक्ति में और साधु सेवा में निरन्तर अग्रसर रहना चाहिए। जैन धर्म प्रचारक विमल पाटनी एवं सुनील भाणजा ने बताया कि आगामी 20 एवं 21 जनवरी को बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती सम्राट आचार्य श्री शान्तिसागर महाराज का शताब्दी वर्ष महोत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा जिसमें सकल दिगम्बर जैन समाज द्वारा अनेक धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। राकेश संधी ने बताया कि महोत्सव के अन्तर्गत शान्तिसागर महाराज की 21 फीट ऊंची स्मारक का लोकार्पण भी किया जाएगा। जिसकी तैयारियां जोरों पर चल रही है। इस अवसर पर बड़ा जैन मंदिर अध्यक्ष विनोद जैन, मंत्री मोहित चंवरिया, कोषाध्यक्ष विमल गिन्दोडी़ , महावीर प्रसाद पराणा, अशोक बिलाला, मनोज पाटनी, विष्णु बोहरा, दिलीप भाणजा, अमित कटारिया, लालचंद कठमाणा, सुशील नीरा जैन, हुकमचंद जैन, ज्ञानचंद सोगानी, त्रिलोक सिरस पदमचंद टोंग्या राकेश संधी त्रिलोक रजवास, अतुल ठोलिया सहित अनेक गणमान्य लोग मौजूद थे।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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