अद्भुत दिगंबर की साधना भीषण शीतलहर में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज का राजगढ़ से तिजारा की

धर्म

अद्भुत दिगंबर की साधना भीषण शीतलहर में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज का राजगढ़ से तिजारा की 

 राजगढ़ 

    अत्यधिक सर्दी एक और शरीर में कंपन और धूजणी प्रारंभ कर देती है और रात्रि को दो-दो रजाइयों में नींद आ रही है,सम्पूर्ण तन को पूरी तरह से ढके रहते हैं,गर्म कपड़ों के लबादे से स्वयं को लदे रहते हैं।वहीं इस कड़ाके की ठंड में दिगंबर संतो की साधना अद्धभुत ,अतुलनीय और पूरे विश्व को अचंभित करने वाली है।जीरो डिग्री टेम्परेचर में दिगम्बर रहकर साधना रत रहते हैं। यदि विश्व में सात अजूबे हैं तो आठवां अजूबा दिगंबर संत है जिनकी साधना, संयम और तप देखते ही बनता है। पूरे विश्व में जितने भी धर्म है उन सब में तप और तपस्या के हिसाब से देखा जाए तो जैन धर्म सर्वोच्च स्तर पर है। दिगम्बर मुनिराजों की क्रिया देखकर हर जनमानस दांतो तले उंगली दबाने लगता है और मन ही मन कह उठता है धन्य हो दिगम्बर मुनिराज जो इतना कठिन तप करते हैं। शीत हो या ग्रीष्म सभी ऋतुओं में दिगंबर जैन संतो ने अपनी साधना के साथ जैनत्व का मान कायम रखे हुए हैं। 

 

 

   ऐसा ही नजारा रविवार की बेला में देखने को मिला जब सूरज के दर्शन नहीं चारों तरफ कोहरा उस बीच दिगंबर संत आकाश ओडन धरती कोबिछौना मानकर राजगढ़ से तिजारा की ओर विहार किया 

 मंगल विहार के क्षणों के पलो को बताते हुए रामगंजमंडी के श्री मनीष सिंघल, श्रीमती पूजा सिंघल, राघव सिंघल एवम नीरज जैन बताते हैं कि हमने आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज के साथ राजगढ़ से तिजारा की ओर गुरुवर के साथ पैदल बिहार में सम्मिलित हुए घना कोहरा धुंध दूर-दूर तक आदमी दिखाई नहीं दे रहा लेकिन गुरुवर भीषण जीत लहर की परवाह न करते हुए बस चले जा रहे थे हम लोग जर्सी स्वेटर आदि पहने हुए चल रहे थे लेकिन गुरुवर तो निष्प्रहता निर्मोहिता रखते हुए मंगल विहार कर रहे थे l हम भी गुरुवर के साथ मंगल विहार में सम्मिलित हो गए गुरुदेव ने ऐसी सर्दी के बीच भी हमें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया और रामगंज मंडी नगर को भी मंगल आशीर्वाद दिया हमने गुरुदेव के साथ पैदल चलना शुरू किया थोड़ी देर हमें सर्दी का एहसास हुआ लेकिन बाद में गुरुदेव की साधना संयम का प्रतिफल हुआ कि गुरुदेव ने हमारा हाथ थामा और हम पैदल चलने लगे पैदल चलते हुए हमें भी सर्दी का एहसास नहीं होने लगा।

  सचमुच ऐसा अदम्य साहस निर्भीक साधना पंचम काल में दिगंबर संत में ही देखी जा सकती है।

 क्या पंक्तियां है जो सच में सार्थकता सिद्ध करतीहैं

 जग के उन सब मुनिराजों को मेरा नम्र प्रणाम है ।।

मोक्षमार्ग पर अंतिम क्षण तक, चलना जिनको इष्ट है। 

जिन्हें न च्युत कर सकता पथ से, कोई विघ्न अनिष्ट है।।

दृढ़ता जिनकी है अगाध, और जिनका शौर्य अदम्य है।

साहस जिनका है अबाध, और जिनका धैर्य अगम्य है।।

जिनकी है निस्वार्थ साधना, जिनका तप निष्काम है। मेरा नम्र प्रणाम है जबकि उन सब मुनिराजो कोमेरा नम्र प्रणाम है 

 

 

 

हर उपसर्ग सहन जो करते, कहकर कर्म विचित्रता।तन तज देते किंतु न तजते, अपनी ध्यान पवित्रता।।

एक दृष्टि से देखा करते, गर्मी वर्षा ठंड जो तप्त उष्ण लौ रिमझिम वर्षा, शीत तरंग प्रचंड जो।।

जिनको ज्यों है शीतल छाया, त्यों ही भीषण घाम है 

जग के उन सब मुनिराजो को मेरा नम्र प्रणाम है।

 

 

जिन्हें कंकड़ों जैसा ही है, मणि मुक्ता का ढेर भी।

जिनका समता धन खरीदने, को असमर्थ कुबेर भी।।

दूर परिग्रह से रह माना, करते हैं संतोष जो।

रत्नत्रय से भरते रहते, अपना चेतन कोष जो।।

और उसी की रक्षा में, रत रहते आठों याम हैं ।

जग के उन सब मुनिराजों को, मेरा नम्र प्रणाम है सिद्धों की श्रेणी में आने वाला जिनका नाम है।

       अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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