विकलांगता मुक्त बिहार बनाने के लिये पटना के पद्मश्री बिमल कुमार जैन जी- जान से लगे हुये हैं।
देश के जिस राज्य बिहार को बीमारू और पिछड़े राज्यों में शामिल किया जाता है ,उसी राज्य का नक्शा बदल कर उसे इक्कीसवीं सदी का विकलांगता मुक्त बिहार बनाने के लिये पटना के पद्मश्री बिमल कुमार जैन जी- जान से लगे हुये हैं।

जयप्रकाश नारायण जी का नारा “सत्ता नहीं, समाज बदलना है” इस ध्येय के साथ वह पिछले तीस वर्षों से विकलांगता को मिटाने के लिये संकल्प बद्ध हैं और सक्रिय रूप से इस दिशा में कार्य कर रहे हैं । अब तक उनकी संस्था के द्वारा छत्तीस हजार लोगों को कृत्रिम अंग लगाये जा चुके हैं। नौ हजार से ज्यादा बच्चों की पोलियो शल्य चिकित्सा ,दस हजार से ज्यादा बच्चों को फिजियोथेरेपी, आठ हजार से ज्यादा बच्चों को न्यूरोथैरेपी दी जा चुकी है।

यह तो सिर्फ एक आंकड़ा है ।सही मायने में तो श्री बिमल जैन जी की कोशिश यही है कि आने वाले हर
मरीज को अपने बच्चों की तरह ही सही इलाज मिल सके।
इनके इस सफर की शुरुआत 1997 में हुई जब पटना में भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति के सौजन्य से विकलांगों का दस दिवसीय कैम्प लगाया गया। उस कैम्प में पहली बार पूरे बिहार के लगभग 2640 लोगों को आर्टिफिशियल सपोर्ट दिया गया।उस समय दूरदर्शन के ख्यातिप्राप्त सीरियल” परख” ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि शायद भारत का यह पहला शिविर है जहाँ एक शिविर में इतनी बड़ी संख्या में दिव्यांग लाभान्वित हुए।

इसके बाद इन्होंने पटना में ही कृत्रिम अंगों को बनाने के लिये एक छोटे से गैरेज में 18 दिसंबर 1999 को भारत विकास विकलांग पुनर्वास केंद्र के नाम से दिव्यांग अस्पताल की शुरुआत की।
इस संस्था के पहले ही वर्ष में दिव्यांग जनों के लिये
दो हजार से ज्यादा कृत्रिम उपकरण बनाये गये।

सन् 2001 में गुजरात मे आयी भीषण भूकंप के समय विकलांग हुए विस्थापितों के बीच इनकी टीम ने कृत्रिम उपकरण भेंट किया ।
इतने बड़े पैमाने पर समाज सेवा करने के लिये ये बिना किसी सरकारी सहायता के समाज से ही चंदा लेते हैं।
बिमल ् जी कहते हैं कि वैसे तो यह सुविधा सिर्फ गरीब लोगों के लिये है लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि सम्पन्न परिवारों के लोग भी अपने घर के बुजुर्गो को उनके हालातों पर छोड़ देते हैं तो ऐसे घरों के बुजुर्गों को भी ये फ्री सेवा देकर एक संतुष्टि का अनुभव करते हैं।
सेवा की इस शुरुआत के बारे में वह कहते हैं कि इन्हें बचपन से ही मन में एक बेचैनी थी बदलाव लाने की।
1974 में आपातकाल के समय जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में इन्होंने भूमिगत रहकर लोकवाणी पत्रिका का प्रकाशन किया और युवाओं में आपातकाल के विरुद्ध जन आंदोलन में बड़ा योगदान दिया। यूं तो वह राजनीति में आकर भी बड़ी
पारी खेल सकते थे लेकिन अनेकों संस्थाओं के सक्रिय सदस्य श्री बिमल जैन जी दधिचि देहदान समिति के माध्यम से नेत्रदान/अंगदान के लिये कार्य कर रहे हैं।समिति के लगातार प्रयासों से अब तक छह सौ से ज्यादा कोर्निया अस्पतालों को दान में मिल चुका है और स्वैच्छिक नेत्रदान की संख्या भी सैकड़ों में पहुंच चुकी है ।अभी तक छः देहदान तथा 2 का अंगदान संभव हो सका है।
बिहार बाल अधिकार आयोग के सदस्य के रूप में इन्होंने उपेक्षित और शोषित महिलाओं के पुनर्वास और गरीब परिवारों के बच्चों के लिये उल्लेखनीय कार्य किये हैं।
बिहार जैसे राज्य में बदलाव लाने के इस कार्य को करने में किसी अड़चन का सामना करना पड़ा ?वह बताते हैं कि सेवा के कार्यों में उस समय भी कोई पंगा नहीं हुआ और आज तो बिहार में भी बड़े स्तर पर बदलाव आया है और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने भी अपना योगदान दिया है।
भविष्य की योजना के बारे में बात करते हुए ये कहते हैं कि मानसिक विकृति तथा मंदबुद्धि बच्चों के लिये पटना में ही एक बड़ा विश्वस्तरीय सेंटर बनाने जा रहे हैं जहां मूक और बधिर बच्चों को स्पीच थैरेपी और हियरिंग सपोर्ट मिल सके।
वहीं इन लोगों के प्रयास से बिहार के नौ सरकारी मेडिकल कॉलेजों के अस्पतालों में नेत्र बैंक खोलने हेतु आवश्यक तैयारी पूर्ण हो गयी है।
इनके कार्यों के लिये अमेरिका की एक संस्था भी इन्हें
मैन ऑफ द ईयर अवार्ड दे चुकी है।
बिहार के निवासी पद्मश्री बिमल जैन जी जैसे श्रेष्ठी जन ने निश्चित ही अपने राज्य को पिछड़े से अगड़ा बनाने में अपना एक बड़ा योगदान दिया है।
स्वाती जैन पत्रकार
हैदराबाद
7013153327
