*हर मास एक उपवास : आगम सम्मत संयम से तन-मन-आत्मा की विशुद्धि*_*रवि सेठी डीमापुर*_
आधुनिक जीवन की आपाधापी में जहाँ मनुष्य का मन अशांत और शरीर रोगग्रस्त होता जा रहा है, वहीं *भारत मंडप्पम में 12 एवं 13 दिसंबर 2025 को आयोजित द्वि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय जन-मंगल सम्मेलन* ने समाज को आत्मकल्याण का एक पवित्र मार्ग प्रदान किया। इस अवसर पर *साधना महोदधि, उभय मासोपवासी सिंह निष्क्रिडीत व्रत कर्ता दिगम्बर जैनाचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज एवं योगऋषि पतंजलि के बाबा रामदेव द्वारा “हर मास एक उपवास”* का भावपूर्ण उदघोष किया गया।
आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज ने जैन आगमों का संदर्भ देते हुए कहा कि उपवास केवल देह का संयम नहीं, बल्कि आत्मा की निर्मलता का साधन है। *आगम में कहा गया है — उववासेण विसुज्झइ पावं, सुद्धं च होइ मणं। (उपवास से पाप कर्मों की निर्जरा होती है और मन शुद्ध होता है)*। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति नियम, व्रत और श्रद्धा के साथ उपवास करता है, तब आत्मा पर जमे कर्म बंधन शिथिल होने लगते हैं और जीवन में समता, करुणा एवं अहिंसा का भाव जागृत होता है। सम्मेलन में यह भी उल्लेख किया गया कि *जैन दर्शन का मूल मंत्र — “अहिंसा परमो धर्मः” केवल व्यवहार में नहीं, बल्कि आहार-विहार में भी संयम की अपेक्षा करता है।* मासिक उपवास उसी अहिंसक जीवन शैली की सजीव अभिव्यक्ति है।
योगगुरु बाबा रामदेव ने आध्यात्मिक भावभूमि को वैज्ञानिक दृष्टि से जोड़ते हुए कहा कि *उपवास शरीर के लिए तप नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़ने की प्रक्रिया है*। उन्होंने कहा कि योग, प्राणायाम और उपवास से शरीर की अशुद्धियाँ दूर होती हैं और मन ध्यान के योग्य बनता है। जब शरीर हल्का होता है, तभी आत्मा की आवाज़ स्पष्ट सुनाई देती है।
*“हर मास एक उपवास”* तप की सरल, सुलभ और सर्वस्वीकृत साधना है, जिसे कोई भी व्यक्ति अपनी क्षमता अनुसार फलाहार, जल-उपवास या निर्जला के रूप में कर सकता है।
सम्मेलन में उपस्थित संतों एवं समाजसेवियों ने कहा कि यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति महीने में एक दिन भी आत्मचिंतन, स्वाध्याय और संयम को समर्पित कर दे, तो मानसिक तनाव, हिंसा, लालच और असंतोष जैसी प्रवृत्तियों में स्वतः कमी आएगी। यह अभियान केवल धर्म विशेष तक सीमित नहीं, बल्कि मानवता की भलाई के लिए है। यदि हर व्यक्ति महीने में केवल एक दिन भी — *संयम* रखे, साधना करे, सकारात्मक संकल्प ले, तो समाज में — ✔ स्वास्थ्य सुधरेगा, ✔ मानसिक शांति बढ़ेगी, ✔ हिंसा, तनाव और अशांति कम होगी।
*“हर मास एक उपवास”* कोई नारा नहीं, बल्कि स्वयं को शुद्ध करने का संकल्प है, जीवन को संतुलित करने का उपाय है, और आत्मा को उज्ज्वल करने का पथ है।
आइए, इस जन मंगल अभियान से जुड़ें। तन को स्वस्थ रखें, मन को पवित्र बनाएं, और व्रत-नियम के साथ जीवन को ऊँचाइयों तक ले जाएँ।
_यही सच्चा स्वास्थ्य है, यही सच्चा धर्म।_
— *रवि सेठी डीमापुर*






