नवाचार • आचार्य विशुद्ध सागर के लिए शिष्य ने गुरु के लिए ताड़पत्र पर लिखवाया समयसार ग्रंथ, पंचकल्याणक में शास्त्र की जगह भेंट किया
सागर
भारतीय ज्ञान की जैन परंपरा में पांडुलिपियों की संस्कृति सदियों पुरानी है। कागज के आविष्कार से पूर्व भोजपत्र और ताड़पत्र पर ग्रंथ लेखन की परंपरा थी। उसी परंपरा को जीवंत करते हुए आचार्य विशुद्ध सागर महाराज के शिष्य प्रमोद जैन बारदाना ने समयसार ग्रंथ की ताड़पत्र। पांडुलिपि तैयार करवाकर अनोखा। कार्य किया है।
मंगलगिरि में आयोजित पंचकल्याणक महोत्सव में इसे गुरुदेव को समर्पित किया गया। आचार्य श्री को समयसार ग्रंथ से विशेष लगाव है और उनके प्रवचन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुने जाते हैं। जैन आचार्य कुंदकुंद स्वामी द्वारा रचित यह ग्रंथ जैन दर्शन का प्राण माना जाता है। इस दिव्य ग्रंथ। का प्रकाशन समर्पण समूह भारत द्वारा किया गया है तथा इसके निर्माण में निग्रंथ क्रिएशन का योगदान रहा।
अहमदाबाद के कोबा आराधना केंद्र से बनवाई पांडुलिपियां के विषय में शिष्ट प्रमोद जैन बारदाना ने बताया कि गुरुदेव के प्रति भक्ति भाव में उनके मन में विचार आया कि क्यों न आदिगुरु के इस महान ग्रंथ को उसी प्राचीन पद्धति पर लिखवाकर शास्त्र रूप में समर्पित किया जाए। जानकारी करने पर पता चला किकर्नाटक में ताड़पत्र लेखन के विशेषज्ञ आज भीप्राचीन जैन ग्रंथों का प्रतिलिपिकरण करते हैं।
अहमदाबाद के निकट कोबा आराधना केंद्र में इसी विधि से पांडुलिपियां बनती हैं। वहीं से यह वृहद कार्य करवाया गया। परिवार की वंदना और तृप्ति जैन ने बताया कि यह पांडुलिपि मात्र लेखन नहीं, बल्कि जैन ज्ञान परंपरा के संरक्षण का आध्यात्मिक प्रयास है, जिसकी प्रेरणा श्रमणश्री सम्यकसागर महाराज से मिली।

53 ताड़पत्रों पर अंकित कीसमयसार की 415 गाथाएं
पीयूष जैन बारदाना ने बताया कि पांडुलिपि को 90 सेंटीमीटर लंबे और 5 सेंटीमीटर चौड़े ताड़पत्रों पर लिखा गया है। कुल 53 ताड़पत्रों पर समयसार की 415 गाथाएं प्राकृत भाषा में अंकित हैं। ग्रंथ की सुरक्षा के लिए सागौन की लकड़ी की विशेष मंजूषा (बॉक्स) बनवाया गया, जिसमें जैन धर्म के अष्टमंगल चिन्ह, बाहुबली स्वामी और तीर्थंकर भगवान के चित्र उकेरे गए हैं। मंजूषा का भीतरी भाग श्रुत संवेदी श्रमण आदित्यसागर महाराज द्वारा रचित जिनबिंब स्त्रोत से अलंकृत है। इसके दोनों ओर जैन। धर्म का मूल प्रतीक परस्परोपग्रहो जीवनाम भी अंकित किया गया है।
पांडुलिपि निर्माण की प्रक्रिया बेहद वैज्ञानिक होती है
एक मीटर लंबे और दस सेंटीमीटर चौड़े ताड़पत्र ग्रंथ लेखन के लिए सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। इन्हें पहले सुखाया, भिगोया, उबाला और पुनः सुखाया जाता है। इसके बाद इन्हें उचित आकारमें काटकर शलाका नामक लोहे की नुकीली कलम से अक्षर कुरेदे जाते हैं। बाद में काजल पोतने से अक्षर स्पष्ट और स्थायी हो जाते हैं। ग्रंथ के दोनों छोर पर मजबूत लकड़ी के कवरजोड़कर डोरी से सुरक्षित बांधा जाता है। इस पांडुलिपि में यही परंपरागत मानक अपनाए हैं।
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जैन धर्म की गीता माना जाता है ग्रंथराज समयसार
समयसार जैन धर्म का सारभूत एवं अध्यात्म। रस से आप्लावित ग्रंथराज है। जैन धर्म के मूर्धन्य आचार्य कुंदकुंद देव ने प्राकृत भाषा में समय सार ग्रंथ की रचना की थी, जिसको जैन धर्म की गीता भी माना जाता है। शुद्ध तल की निरूपण, पाठक को आकर्षित करती है । ताड़पत्र पांडुलिपि के लिए श्रवणबेलगोला की शक संवत 1704 में लिखी प्रति को आधार बनाया है। क्योंकि यह प्रति ही सर्वाधिक प्राचीन और शुद्ध मानी जाती है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312



