धर्म के लिए दिल और व्यापार में दिमागका उपयोग करना जरूरी : आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज

धर्म

, धर्म के लिए दिल और व्यापार में दिमागका उपयोग करना जरूरी : आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज
देई
कस्बे के जैन नसिया मंदिर में बुधवार को अरहनाथ भगवान के जन्म-तप- कल्याण अवसर पर आचार्य श्री108 विनिश्चय सागर महाराज के ससंघ सानिध्य मेंअभिषेक और शांतिधारा हुई।शांतिधारा का वाचन मुनिश्री 108प्रत्यक्ष सागर महाराज ने किया इसके बाद धर्मसभा हुई ,जिसमें मंगलाचरण अनीता मित्तल ने किया
.

 

आचार्य श्री 108 विनिश्चयसागर महाराज ने प्रवचन में धर्म और व्यापारके अंतर पर चर्चा करते हुए कहा कि व्यक्ति
को धर्म के लिए दिल और व्यापार में दिमाग का उपयोग करना चाहिए। धर्म में श्रद्धा और भक्ति का महत्व है, जबकि व्यापार में बुद्धिमत्ता और समझदारी आवश्यक है।

 

पांचों इंद्रियों को वश में करना उत्तम संयम प्रांजल सागर महाराज
इस बेला में पूज्य मुनि श्री 108 प्रांजल सागर महाराज ने कहा कि मन, वचन, काय व पांचों इंद्रियोंको वश में करना ही उत्तम संयम है। संयम के साथ लगा उत्तम शब्द सम्यक दर्शन की सत्ता का सूचक है। उन्होंने बताया कि संयम शब्द दो शब्दों के मेल से बना है। सम सम अर्थात सम्यक व यम
अर्थात मार देना । सम्यक रूप में विकारी पदार्थों को अपने से अलग कर देना ही संयम है। यह दो प्रकार का होता है। प्राणी संयम व इंद्रिय संयम पांचों इंद्रियों व मन को। वश में करना इंद्रिय संयम है और षटकाय के जीवों की रक्षा होती है।

इंद्रिय संयम से हमें व्रत लेना चाहिए, क्योंकि बिना व्रत के
जीवन, धूप में खड़े इंतजार करने वाले व्यक्ति जैसा होगा, जिस प्रकार नदी में किनारा न हो और गाड़ी में ब्रेक न हो तो दोनों ही बेकार है। इसी प्रकार वाणी संयम,खाने पीने, बोलने, उठने बैठने,सोने में संयम रखना चाहिए।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *