अच्छी खासी जिन्दगी अदालत (संघर्ष ) बन गई है..आज कल रोज नये मामले दर्ज हो रहे हैं..! अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज
जीवन का हर पल – हर क्षण संघर्षमय गुजर रहा है। हम यह नहीं जान पा रहे हैं कि संघर्ष भीतर के द्वन्द का है या बाहर के द्वन्द फन्द का है। भीतर का संघर्ष बाहर जीने नहीं देता और बाहर का संघर्ष शान्ति से रहने नहीं देता।
यूँ देखा जाये तो बचपन माता पिता की अपेक्षाओं की पूर्ति करने में बीतता है,, यौवन श्री – स्त्री के पीछे दौड़ते भागते गुजर जाता है और वृद्धापन शरीर की असहायता और परिवार की उपेक्षा सहन करते करते या जीने की जीवेषणा में निकलता है। भीतर का संघर्ष मान को मारने के लिए, माया को भगाने के लिए, क्रोध को शान्त करने के लिए, मन के लोभ को सन्तोष में तब्दील करने के लिए और मन के विकारों को भगाने के लिए होना चाहिए। बाहर के संघर्ष के लिए हमारी इन्द्रिय, मस्तिष्क, बुद्धि, स्मृति सभी सक्रिय हो जाती है।
भीतर का संघर्ष अपने अन्दर के अज्ञान को काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, विषय वासना को और बुरी आदतों से मुक्त होने के लिए होना चाहिए — तभी जीवन को सही दिशा मिल पायेगी।* क्योंकि आज के आदमी का जीवन युद्ध का मैदान बन गया है,, जहाँ हम अपने जीवन के विभिन्न तरह के उतार-चढ़ाव के संघर्षों से जूझते हुए, मन के द्वन्दों से लड़ते झगड़ते हुये, कभी स्वयं से तो कभी बाहर के अपनों से लड़ते हैं। लेकिन इन सबके बीच हम सबसे अहम भीतर की लड़ाइयों का फैसला नहीं कर पाते हैं,, जबकि भीतर की कमियों को और नकारात्मकता को दूर करके संघर्षमय जीवन को सहर्ष पूर्वक जीना चाहिए और सबको जीने की प्रेरणा देनी चाहिए…!!!






